उप्र में महिलाओं की सुरक्षा पर उठे सवाल

बीते दिसम्बर महीने में दिल्ली में हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद दुष्कर्म के खिलाफ बनाए गए कानून के बावजूद ऐसी घटनाओं में कमी आती नहीं दिख रही। देश के दूसरे हिस्सों की तरह उत्तर प्रदेश में भी हाल के दिनों में महिलाओं और बच्चियों के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की बढ़ती घटना से पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

बीते तीन दिनों में राज्य के अलग-अलग जिलों में महिलाओं, किशोरियों और बच्चियों के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ के 10 से अधिक मामले सामने आए हैं। पिछले 24 घंटे के दौरान प्रतापगढ़ जिले में दो और सिद्घार्थनगर एवं सीतापुर में एक-एक नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म के मामले सामने आए हैं।

लोगों का ऐसा मानना है कि प्रभावी कार्रवाई की कमी और लचर कानून के कारण सख्त सजा न मिलने से असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद रहते हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति एवं सामाजिक कार्यकर्ता रुपरेखा वर्मा कहती हैं कि राज्य में अगर महिलाओं के खिलाफ कोई घटना होती है, तो पुलिस पहले पीड़ित पक्ष को दबाने का प्रयास करती है और अगर मीडिया के दबाव में मामला दर्ज भी कर लिया तो आरोपियों को बचाने की कोशिश की जाती है।

वर्मा ने कहा कि लड़कियों के मन में बैठे डर को निकालने के लिए आरोपियों तथा इन्हें संरक्षण देने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी तत्काल कड़े कदम उठाए जाने की जरूरत है।

सरकार और पुलिस लगातार दावा करती है कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध कम हो रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में साल 2008 में दुष्कर्म के 1696 मामले सामने आए थे, वहीं यह आंकड़ा साल 2009 में 1552, 2010 में 1290 , 2011 में 1945 और 2012 में 1716 रहा है।

राज्य के सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक एस़ आऱ दारापुरी इस संदर्भ में कहते हैं कि राज्य सरकार अपराध के आंकड़े कम दिखाना चाहती है। जिससे कई मामले दर्ज नहीं किए जाते और आरोपी बेखौफ घूमते हैं और घटनाओं को अंजाम देते हैं।

दारापुरी ने कहा, "मैं नहीं मानता कि हमारा कानून लचर है। कानून में कोई कमी नहीं है। कमी इसके क्रियान्वयन में है। अगर पुलिस प्रशासन स्वतंत्र रूप से मुकदमा लिखकर सही ढंग से जांच कर अदालत में प्रभावी पैरवी करे तो दोषियों को कठोर सजा मिलेगी। अपराधियों के मन में कानून का डर बढ़ेगा।"

पुलिस महानिदेशक देवराज नागर ने कहा, "पुलिस को संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाया जा रहा है। लेकिन सबसे पहले पुलिस को अपना आचरण और व्यवहार ठीक रखने की जरूरत है और सामने फरियाद लेकर आने वाले लोगों से अपनत्व भरे व्यवहार के साथ उनके समस्या का समाधान किया जाए। महिलाओं के खिलाफ होने वाली ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाना पुलिस की प्राथमिकता है।"

महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों के लिए जहां कुछ समाजसेवी पुलिस की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, वहीं कुछ बुद्घिजीवी इसे सामाजिक समस्या भी बता रहे हैं।

लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष राजेश मिश्रा कहते हैं कि कई बार करीबी रिश्तेदार भी ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं और इसकी वजह हमारे समाज का ढांचा खुला न होना है। दमित इच्छाएं और कुंठित मन भी इसकी वजह है, और ऐसी मानसिकता वाले लोगों को जब भी मौका मिलता है, वे अपनों पर भी ऐसे हमले कर देते हैं। इसलिए कानून में सुधार के साथ-साथ समाज को भी पहल करनी होगी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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