नई दिल्ली: फेसबुक, व्हाट्सएप और डेटिंग एप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यदि खुशी के आंसुओं के साथ हंसने और ब्लोइंग किस देने वाले इमोटिकॉन्स अपके पसंदीदा इमोजी हैं, तो आप देश के बहुत से लोगों में से एक हैं। एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ज्यादातर भारतीयों द्वारा इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यही इमोटिकॉन्स प्रयोग में लाए जाते हैं।

17 जुलाई, बुधवार को वर्ल्ड इमोजी डे है।

वर्ल्ड इमोजी डे से एक दिन पहले टेक कंपनी बोबल एआई ने एक रिपोर्ट साझा की है, जिसमें 'खुशी के आंसू' और 'ब्लोइंग ए किस' इमोजी को भारत में स्मार्टफोन कन्वर्सेशन में उपयोग किए जाने वाले शीर्ष दो इमोटिकॉन्स के रूप में बताया है।

दूसरे शीर्ष दस इमोजी हैं: स्माइलिंग फेस विद हार्ट आईज, किस मार्क, ओके हैंड, लाउडली क्राइंग फेस, बीमिंग फेस विद स्माइलिंग आईज, थम्स अप, फोल्डेड हैंड्स और स्माइलिंग फेस विद सनग्लासेस।

व्हाट्सएप पर भी इसी प्रकार के इमोजी हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि त्योहारों और राष्ट्रीय पर्वो के दौरान इमोटिकॉन्स के प्रयोग में काफी प्रयोग देखने को मिला।

डेटिंग एप में, ए विंक करते इमोजी और खाने का मजा लेते इमोजी का काफी इस्तेमाल देखने को मिला।

रिपोर्ट में दावा किया गया है, "डेटिंग एप कन्वर्सेशन में इस्तेमाल किए जाने वाले इमोजी खशी जाहिर करने के लिए, फ्लर्ट और रोमैंटिक होने के लिए प्रयोग किए जाते हैं।"

बोबल एआई के सह-संस्थापक अनित प्रसाद ने आईएएनएस से कहा, "इमोजी धीर-धीरे हमारे डिजिटल संस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं और एक दूसरे से बात करने के लिए एक नया मार्ग दिखा रहे हैं।"

वर्ष 2018 से लेकर वर्तमान तक के आंकड़ों को रिपोर्ट में शामिल किया गया है।

--आईएएनएस

न्यूयॉर्क: आधुनिक समय में कॉलेज में तनावपूर्ण होते हैं, विद्यार्थियों को कक्षाएं, परीक्षाएं और ऐसी ही कई चीजों का दबाव रहता है। शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक शोध में इस बात का पता लगाया है कि कुत्ते या बिल्ली पालने से विद्यार्थियों को तनाव से राहत देने वाले शारीरिक लाभों के साथ-साथ उनके मूड में सुधार लाया जा सकता है। जर्नल एईआरए ओपन में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, कई विश्वविद्यालयों ने 'पेट योर स्ट्रेस अवे' कार्यक्रम चलाया है, जहां विद्यार्थी आकर कुत्ते और बिल्लियों से बात कर सकते हैं, उनके साथ खेल सकते हैं।

वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर पेट्रीसिया पेंड्री ने कहा, "सिर्फ दस मिनट से महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। हमारे अध्ययन में जिन विद्यार्थियों ने कुत्ते और बिल्लियों संग समय बिताया उनमें कॉर्टिसोल हॉरमोन में उल्लेखनीय कमी पाई गई। यह तनाव पैदा करने वाला एक प्रमुख हॉरमोन है।"

इस अध्ययन में 249 कॉलेज विद्यार्थियों को शामिल किया गया जिन्हें चार समूहों में बांट दिया गया। इनमें से पहले समूह को कुत्ते और बिल्लियों संग दस मिनट का समय बिताने को दिया गया।

परीक्षण में पाया गया कि जिन विद्यार्थियों ने जानवरों संग वक्त बिताया, इस मुलाकात के बाद उनके लार में कॉर्टिसोल बहुत कम पाया गया।

पेंड्री का कहना है कि हम बस यह देखना चाहते थे कि इस तरह के कार्यकलाप से तनाव में कमी आती है या नहीं और इससे तनाव में कमी आई। यह काफी रोमांचक है क्योंकि हो सकता है कि स्ट्रेस हॉरमोन में कमी वक्त के साथ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण लाभ पहुंचाए।

--आईएएनएस

नई दिल्ली: शोधकर्ताओं ने पाया है कि जो बच्चे समय से पहले जन्म ले लेते हैं, उनमें रोमांटिक होने, यौन संबंध बनाने और पितृत्व सुख प्राप्ति की संभावना उचित समय पर जन्म लेने वाले बच्चों की तुलना में कम होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के मामले में अग्रणी देश है, जहां शिशु 37 सप्ताह के गर्भ से पहले पैदा होते हैं और यह संख्या बढ़ रही है।

जामा नेटवर्क ओपन पत्रिका में छपे शोधपत्र के अनुसार, 44 लाख प्रतिभागियों पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि जो लोग समय से पहले जन्मे, उनमें रोमांटिक संबंध बनाने की संभावना 28 प्रतिशत कम मिली। इसके अलावा ऐसे लोगों में अन्य साधारण लोगों की अपेक्षाकृत माता-पिता बनने की संभावना भी 22 प्रतिशत कम पाई गई।

वारविक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कहा, "समय से पहले जन्म लेना कुछ हद तक शर्मीले स्वभाव, समाज से दूरी के अलावा किशोरावस्था में जोखिम लेने की कम संभावना से जुड़ा हुआ है।"

विशेषज्ञों ने कहा कि समय से पूर्व जन्मे बच्चों को उनके स्कूल से लेकर माता-पिता द्वारा कम उम्र में ही सामाजिक संबंधों के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है, जिससे जब वह किशोरावस्था में कदम रख रहे होंगे तो उन्हें किसी से मिलने-जुलने और सामाजिक होने में मदद मिल सकेगी।

दिल्ली में श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के कंसल्टेंट मनोचिकित्सक अमित गर्ग ने आईएएनएस को बताया, "पर्याप्त समय से पहले जन्म लेना न केवल बच्चों की शारीरिक वृद्धि को प्रभावित करता है, बल्कि इससे मानसिक विकास पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। यह कुछ मामलों में जीवन भर के लिए होता है। एक अध्ययन में कहा गया है कि ऐसे बच्चों के पोषण और अन्य संबंधित बीमारी के बारे में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।

उन्होंने कहा, "समय से पहले पैदा हुए युवाओं को अपने जीवन में सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जो उनके रोमांटिक रिश्तों और बच्चे पैदा करने को प्रभावित कर सकता है।"

--आईएएनएस

बेंगलुरू: भारत के लोग अभी भी टैक्स बचाने और निवेश के लिए बीमा खरीदते हैं, हालांकि अब धीरे-धीरे लोगों में जागरूकता आ रही है वे मानने लगे हैं कि बीमा का मतलब सुरक्षा होता है। हेल्थ इंश्योरेंस सर्वे में शामिल 98 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने मेडिकल खर्चो के लिए वित्तीय सुरक्षा हासिल करने हेतु हेल्थ इंश्योरेंस खरीदा। सर्वेक्षण में शामिल लगभग 40 फीसदी लोगों ने माना कि हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी चुनते वक्त उसका क्लेम सेटलमेंट रेश्यो सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसके बाद हॉस्पिटल का नेटवर्क, ब्रांड, रिश्तेदारों और मित्रों की सलाह की भूमिका अहम होती है। एक चौथाई उत्तरदाताओं ने कवर राशि चुनते वक्त महंगे होते इलाज को सबसे महत्वपूर्ण पहलू माना।

पॉलिसीबाजार डॉट कॉम पर 5,600 मौजूदा बीमा ग्राहकों का सर्वेक्षण किया गया और बीमा के प्रति उनके दृष्टिकोण, धारणा और व्यवहार को जानने की कोशिश की गई। सर्वे के परिणाम यह दिखाते हैं कि 24 फीसदी ग्राहकों ने टैक्स बचाने और जीवन में आए बड़े निजी बदलाव जैसे कि विवाह और बच्चों का जन्म जैसे विभिन्न कारकों को अधिक महत्व दिया।

लाइफ इंश्योरेंस सर्वे के परिणाम मुताबिक, 10 में से 6 प्रतिभागियों ने टर्म लाइफ इंश्योरेंस को वित्तीय सुरक्षा के लिए खरीदा। लगभग 38 फीसदी प्रतिभागियों ने विभिन्न कारणों के चलते कवर खरीदा, जिसमें खुद को और अपने परिवार को वित्तीय रूप से सुरक्षित करना और टैक्स बचाने जैसे कारण शामिल थे।

सर्वे के मुताबिक, 10 में से 4 उत्तरदाताओं ने एक ऐसा टर्म कवर खरीदा, जिसने उन्हें रिटायर होने तक वित्तीय सुरक्षा प्रदान की या फिर वे अपने वित्तीय जिम्मेदारियों या देनदारियों से पूरी तरह मुक्त रहे। लगभग एक तिहाई उपभोक्ताओं ने उतनी अवधि के लिए टर्म इंश्योरेंस खरीदा, जितनी कि उनकी कमाई करने की अवधि है।

मोटर इंश्योरेंस सर्वे के परिणाम के मुताबिक, 10 में से 7 मोटर इंश्योरेंस ग्राहकों ने इसलिए बीमा खरीदा क्योंकि यह वाहन मालिकों के लिए अनिवार्य है और यह वाहन के नुकसान या चोरी के चलते होने वाले वित्तीय नुकसान के प्रति सुरक्षा प्रदान करता है। एक तिहाई उत्तरदाताओं ने थर्ड पार्टी दायित्व को ध्यान में रखते हुए मोटर बीमा खरीदा था। 10 में से 5 उपभोक्ताओं को यह पता था कि थर्ड पार्टी कवर कानूनी रूप से अनिवार्य है।

--आईएएनएस

 

 

 

न्यूयॉर्क: कार दुर्घटनाओं में अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में महिलाओं को चोटों की संभावना अधिक होती है। एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह बात कही है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि कार दुर्घटना में बेल्ट लगाई हुई महिला के बेल्ट लगाए पुरुषों की तुलना में 73 प्रतिशत अधिक गंभीर रूप से घायल होने की संभावना होती है।

इसमें टक्कर की गंभीरता नियंत्रण करने के बाद, उम्र, कद, बॉडी मास इंडेक्स और वाहन मॉडल वर्ष आदि कारक शामिल हैं।

वर्जीनिया विश्वविद्यालय के प्रधान वैज्ञानिक जेसन फोर्मैन ने कहा, "जब तक हम महिलाओं के लिए जोखिम बढ़ाने में योगदान देने वाले मूलभूत बायोमैकेनिकल कारकों को नहीं समझते हैं, हम जोखिम अंतराल को बंद करने की अपनी क्षमता में सीमित रहेंगे।"

शोधकर्ताओं के अनुसार, नए ऑटोमोबाइल ने समग्र रूप से चोट के कम जोखिम का प्रदर्शन किया है।

विशेष रूप से, खोपड़ी के फ्रैक्चर, गरदन की रीढ़ की चोट और पेट की चोट के लिए जोखिम कम हो गया है। घुटने-जांघ-कूल्हे और टखने में चोट लगने का जोखिम भी काफी कम हो जाता है।

जर्नल ट्रैफिक इंजरी प्रिवेंशन में प्रकाशित अध्ययन, 1998 से 2015 तक संकलित दुर्घटना और चोट के आंकड़ों का विश्लेषण है। ये डेटा अमेरिका में पुलिस द्वारा रिपोर्ट किए गए क्रैश से लिए गए हैं।

यह अध्ययन 13 से अधिक आयु वर्ग के बेल्ट पहने अग्र प्रभाव दुर्घटनाओं पर केंद्रित था। डेटा में लगभग 23 हजार फ्रंट-एंड क्रैश शामिल थे।

--आईएएनएस

न्यूयॉर्क: जैसे-जैसे औरत की उम्र बढ़ने लगती है शारीरिक संबंध में उनकी रुचि भी कम होने लगती है। इसके कई कारण हैं जैसे कि पार्टनर की कमी, विधवा हो जाना, रजोनिवृत्ति से संबंधित लक्षण, साथी का खराब स्वास्थ्य और रिश्ते से संबंधित मुद्दे। 'मेनोपॉज : द जर्नल ऑफ द नॉर्थ अमेरिकन मेनोपॉज सोसायटी' में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, नियमित तौर पर शारीरिक संबंध बनाने वाली औरतों की रुचि उम्र के साथ-साथ कम होने लगती है और रजोनिवृत्ति के बाद शारीरिक संबंध का आनंद उठाने वाली महिलाओं की संख्या और भी कम है।

इस अध्ययन में रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में इस बात का निरीक्षण किया गया कि किस तरह से रिश्तों में घनिष्ठता, स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक कारक इन महिलाओं में यौन अंतरंगता को प्रभावित करती है।

नॉर्थ अमेरिकन मेनोपॉज सोसायटी की चिकित्सा निदेशक स्टेफनी फ्यूबियन ने कहा, "उम्र बढ़ने के साथ-साथ यौन स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां महिलाओं में आम है और साथी भी महिलाओं की यौन गतिविधि और संतुष्टि में एक प्रमुख कारक निभाते हैं।"

फ्यूबियन ने आगे कहा, "इसके अलावा रजोनिवृत्ति संबंधी समस्याएं जैसे कि शरीर के अंदरूनी हिस्से में सूखापन और संबंध बनाने के दौरान दर्द, इनकी पहचान भी यौन गतिविधि को प्रभावित करने वाले कारकों के रूप में की गई है। प्रभावपूर्ण चिकित्सकीय सुविधाओं के उपलब्ध होने के बावजूद कुछ ही महिलाएं इनसे संबंधित ट्रीटमेंट करवाती हैं।"

शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया कि कैसे और क्यों रजोनिवृत्ति के दौरान और इसके बाद महिलाओं में शारीरिक संबंध में रुचि घटने लगती है।

अध्ययन के लिए कई जैविक कारकों पर शोध किया गया जैसे कि अचानक शरीर का तापमान बढ़ जाना, नींद में कमी, शरीर के अंदरूनी हिस्से में सूखापन और शारीरिक संबंध बनाने के दौरान पीड़ा।

हालांकि जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं वह है विभिन्न मनोसामाजिक परिवर्तन, रजोनिवृत्ति के बाद जिनका होना आम है। इसमें शरीर की बनावट को लेकर अधिक सचेत होना, आत्म-विश्वास और कथित वांछनीयता, तनाव, मूड में परिवर्तन और रिश्ते से संबंधित मुद्दे शामिल हैं।

ब्रिटेन के ओवेरियन कैंसर ट्रायल के परीक्षण में शामिल रजोनिवृत्ति के बाद वाली महिलाओं के आंकड़े हैं और निष्कर्षो से यह पता चलता है कि वार्षिक स्क्रीनिंग के शुरू होने से पहले ही आधी महिलाएं ही यौन संबंधी गतिविधियों में सक्रिय थी।

समय के साथ-साथ इन महिलाओं की शारीरिक गतिविधियों में कमी पाई गई।

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नई दिल्ली: अगर आपको लगता है कि कम मात्रा में शराब पीने से आपको ज्यादा नुकसान नहीं होगा, तो आपको फिर से सोचने की जरूरत है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि शराब छोड़ने से पूरी तरह से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है। खासकर महिलाओं के लिए यह अधिक कारगर है।

शराब का औसत सेवन पुरुषों के लिए सप्ताह में 14 पैग जबकि महिलाओं के लिए सप्ताह में 7 पैग निर्धारित किया गया है।

अध्ययन में पाया गया है कि जिन पुरुष और महिलाओं ने जीवनभर शराब से दूरी बनाए रखी, उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहा।

सीएमएजे पत्रिका में प्रकाशित खबर के अनुसार, जो महिलाएं औसत शराब पीती थी या शराब पीना छोड़ देती थी, उनमें मानसिक तौर पर सकारात्मक बदलाव देखने को मिले।

फिलहाल यह अध्ययन चीन व अमेरिका के नागरिकों पर हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध भारतीय नागरिकों पर भी किया जा सकता है।

गुरुग्राम के नारायणा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के परामर्श चिकित्सक गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी नवीन कुमार के मुताबिक, एक महीने के लिए भी शराब छोड़ना पेट और शरीर की रस प्रक्रिया (मेटाबॉलिक) सिस्टम को दुरुस्त करने में मदद कर सकता है और इसके लक्षणों को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि यह दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ को भी बढ़ावा देता है।

नवीन ने आईएएनएस को बताया, "एक स्वस्थ मस्तिष्क और जिगर के लिए शराब से परहेज अनिवार्य है। एक मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली और दिल के लिए भी शराब से दूरी बनानी जरूरी है। खासकर महिलाओं पर शराब का प्रभाव अधिक हानिकारक है।"

नोएडा के जेपी अस्पताल में वरिष्ठ परामर्श चिकित्सक मृणमय कुमार दास ने आईएएनएस को बताया, "शराब हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के लिए हानिकारक है और हमारी मनोदशा में उतार-चढ़ाव ला सकती है। शराब हमारे मस्तिष्क में सेरोटोनिन के स्तर को कम करती है। इसके नियमित सेवन से मस्तिष्क का रसायन विज्ञान बदल जाता है जिससे मस्तिष्क स्वास्थ्य में गिरावट आती है।"

--आईएएनएस

लंदन: जीवन के शुरुआती सालों में ही यदि बच्चों को घर में पढ़ाई के लिए अच्छा माहौल मिल जाए, तो वे होम लर्निग के माध्यम से भविष्य में अच्छी श्रेणी में उत्तीण हो सकते हैं और पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। एक शोध में यह बात सामने आई है। 'स्कूल प्रभावशीलता और स्कूल सुधार' में प्रकाशित शोध में यह बात सामने आई है कि जिन बच्चों के माता-पिता ने स्कूल भेजने से पहले ही बच्चों के साथ पढ़ा और किताबों के बारे में बात की, वे सभी 12 साल की उम्र में गणित के विषय में अच्छे अंक लेकर आए।

बामबर्ग विश्वविद्यालय हुए शोध के प्रमुख लेखक सिमोन लेहरल ने कहा, "हमारे परिणाम न केवल साक्षरता, बल्कि संख्यात्मकता में भी विकास के लिए बच्चों को पुस्तकों के लिए उजागर करने के महान महत्व को रेखांकित करते हैं।"

उन्होंने कहा, "प्रारंभिक भाषा कौशल न केवल एक बच्चे के पढ़ने में सुधार करते हैं, बल्कि उसकी गणितीय क्षमता को भी बढ़ाते हैं।"

निष्कर्ष के लिए शोधकर्ताओं ने 229 जर्मन बच्चों का तीन साल की उम्र से लेकर माध्यमिक विद्यालय तक अध्ययन किया।

प्रतिभागियों की साक्षरता और संख्यात्मक कौशल का परीक्षण उनके तीन साल के पूर्वस्कूली (उम्र 3-5) में किया और दूसरी बार फिर जब वे 12 या 13 वर्ष के हुए तब यह परीक्षण किया गया।

उन्होंने पाया कि बच्चों ने अपने पूर्वस्कूली वर्षों में साक्षरता, भाषा और अंकगणितीय कौशल घर के प्रोत्साहन से प्राप्त किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने इसके बाद घर में सीखने के माहौल की परवाह किए बिना माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने और गणितीय कौशल में उच्च परिणाम प्राप्त किए।

--आईएएनएस

लंदन: शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि अक्करमेंसिया म्यूसिनीफिला जो मानव आंत्र में उपस्थित जीवाणु की एक प्रजाति है, पास्चुरीकरण के रूप में इसका उपयोग करने से यह विभिन्न हृदय रोग जोखिम कारकों से अधिक सुरक्षा प्रदान करती है। पत्रिका 'नेचर मेडिसिन' में प्रकाशित इस निष्कर्ष के मुताबिक, लौवेन यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम ने मानव शरीर में प्रभावी बैक्टीरिया पर अध्ययन किया।

इसके लिए 42 प्रतिभागियों को नामांकित किया गया और 32 ने इस परीक्षण को पूरा किया। शोधकर्ताओं ने मोटे प्रतिभागियों को अक्करमेंसिया दिया, इन सभी में डायबिटीज टाइप 2 और मेटाबोलिक सिंड्रोम देखे गए। यानी इनमें दिल की बीमारियों से संबंधित जोखिम कारक थे।

प्रतिभागियों को तीन समूहों में बांट दिया गया- एक जिन्होंने जीवित बैक्टीरिया लिया और दो जिन्होंने पास्चुरीकृत बैक्टीरिया लिया- इन दोनों समूहों के सदस्यों में अपने खान-पान और शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन करने के लिए कहा गया। इन्हें अक्करमेंसिया न्यूट्रीशनल सप्लीमेंट के तौर पर दिया गया।

अक्करमेंसिया का सेवन इन प्रतिभागियों को तीन महीने तक लगातार करना था।

शोधकर्ताओं ने पाया कि इस सप्लीमेंट को खाना आसान रहा और जीवित और पास्चुरीकृत बैक्टीरिया लेने वाले समूहों में कोई साइड इफेक्ट नहीं देखा गया।

पास्चुरीकृत बैक्टीरिया ने प्रतिभागियों में डायबिटीज 2 और दिल की बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम कर दिया।

इससे लिवर के स्वास्थ्य में भी सुधार देखा गया, प्रतिभागियों के शारीरिक वजन में भी गिरावट (सामान्यतौर पर 2.3 किलो) देखी गई और इनके साथ ही साथ कोलेस्ट्रोल के स्तर में भी कमी आई।

--आईएएनएस

बेंगलुरू: एक अभिभावक के रूप में ऐसी क्या चीज है जो आप सोचते हैं कि आपको पहले से पता होनी चाहिए थी? और वह है निवेश और इसके लिए बेहतर चाइल्ड प्लान का चुनाव भी जरूरी है।

कई लोगों को यह लगता है कि अच्छा होता अगर उन्हें पहले से यह पता होता और बेहतर चाइल्ड प्लान में निवेश समय पर शुरू कर दिया होता तो वे अपने बच्चे के उच्च अध्ययन और अन्य इच्छाओं का खयाल रख पाते।

पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के चीफ बिजनेस ऑफिसर (लाइफ इंश्योरेंस) संतोष अग्रवाल यहां जानकारी दे रहे चाइल्ड प्लान का चुनाव कैसे करें :

जीवन के नियमित खर्चो के अलावा अधिकतर शहरी मध्यम-वर्गीय परिवारों के लिए, जिनके बच्चे भी होते हैं, शिक्षा का खर्च सबसे बड़ा होता है। ऐसे में अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए योजना बनाने के लिए कभी भी ना सोचें कि अभी तो काफी वक्त है। हो सकता है कि आपका बच्चा उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना चाहेगा या फिर भारत के किसी बड़े शिक्षा संस्थान में दाखिला लेना चाहेगा। उसकी पसंद चाहे जो भी हो, आपको शिक्षा के खर्च का बंदोबस्त हमेशा तैयार रखना होगा।

इस स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती उच्च शिक्षा के खर्च के रूप में पेश आ सकती है, जो कि आमतौर पर पोस्ट ग्रेजुएट या मास्टर्स की पढ़ाई के लिए होगी। भले ही कई माता-पिता जानते होंगे कि बच्चे की शिक्षा के लिए बड़ी राशि जमा करनी पड़ेगी, लेकिन अधिकांश अभिभावकों के लिए इस शिक्षा खर्च का अनुमान लगाना मुश्किल होता है।

इसे एक उदाहरण के जरिये समझते हैं। मान लें कि आपका बच्चा आज से 15 साल बाद आईआईएम जैसे एक प्रमुख शिक्षा संस्थान से मैनेजमैंट में प्रोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम में एडमिशन लेना चाहेगा, तो आपको उस वक्त 93 लाख रुपये खर्च करने के लिए तैयार रहना होगा। इस कोर्स के लिए मौजूदा खर्च 23 लाख रुपये है।

अगर आपका बच्चा इस कोर्स के लिए विदेश जाना चाहे, तो आपको इस खर्च की तैयारी भी करनी पड़ेगी। अगर आपका बच्चा उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाना चाहता है तो वहां की शैक्षणिक महंगाई दर (लगभग 5 प्रतिशत) और अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये के बीच विदेशी मुद्रा एक्सचेंज दर को भी अपनी योजना में शामिल करें।

आप बच्चे के जन्म के 60 से 90 दिनों के अंदर ही निवेश शुरू करें, ताकि आसानी से एक बड़ी राशि इकट्ठा हो सके। देर करने से जीवन में आगे चलकर यह राशि जुटाना संभव नहीं होगा। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के अनुसार, निवेश में होने वाले चक्रवृद्धि प्रभाव लंबी अवधि तक निवेश करने से मिलता है, जिससे आपका निवेश कई गुना बढ़ता है।

आप यूनिक लिंक्ड चाइल्ड प्लान में निवेश से शुरूआत कर सकते हैं और मैच्युरिटी से पहले पॉलिसी का जोखिम घटाने के लिए उसे सुरक्षित फंड्स में शिफ्ट कर दें। यूलिप आधारित चाइल्ड प्लान का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बच्चे के अभिभावक की अचानक मृत्यु होने पर इनके साथ प्रीमियम वेवर राइडर होता है और इसके बाद के सभी प्रीमियम या तो माफ कर दिए जाते हैं या फिर बीमा कंपनी खुद इसका भुगतान करती है। अन्य चाइल्ड प्लान्स की तरह यह पॉलिसी बंद नहीं होती बल्कि पहले की तरह जारी रहती है। बीमा कंपनी पॉलिसी अवधि तक अभिभावक की ओर से भविष्य के सभी प्रीमियम चुकाती है। इसके साथ आपका निवेश बढ़ता रहता है और पॉलिसी की मैच्युरिटी पर आपके बच्चे की जरूरत के लिए यह राशि कम नहीं पड़ती है। यही एक प्रमुख कारण है जो यूलिप आधारित चाइल्ड प्लान्स को बाजार में सबसे आकर्षक निवेश प्रोडक्ट बनाता है।

एक अभिभावक होने के नाते आपके लिए अच्छी तरह से निवेश रणनीति बनाना बेहद जरूरी है और जरूरत के अनुसार छोटी, मध्यम और लंबी-अवधि के फंड्स चुनना चाहिए।

--आईएएनएस