नई दिल्ली: उच्च रक्तचाप दिल (हाइपरटेंशन) दुनियाभर में लोगों को आम रूप से प्रभावित करने वाला रोग है। आपको बगैर किसी लक्षण के वर्षो से उच्च रक्तचाप हो सकता है। यहां तक कि बगैर लक्षण के आपकी रक्त वाहिकाओं और आपके हृदय को नुकसान पहुंचना जारी रहता है और उसकी पहचान की जा सकती है। इस तरह उच्च रक्तचाप दिल के लिए नुकसानदेह है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, हाइपरटेंशन को हाई या बढ़े हुए रक्तचाप के रूप में भी जाना जाता है, जो ऐसी स्थिति होती है जिसमें रक्त वाहिकाओं में लगातार रूप से दबाव बढ़ जाता है। रक्त वाहिकाओं के माध्यम से हृदय से शरीर के सभी अंगों की ओर भेजा जाता है। हृदय जितनी बार धड़कता है, यह रक्त को वाहिकाओं में पंप करता है। रक्तचाप का निर्माण हृदय द्वारा पंप किए जाने पर खून द्वारा वाहिकाओं (धमनियों) की दीवार पर लगाए जाने वाले बल के कारण होता है। दबाव जितना अधिक होगा, हृदय के लिए रक्त को पंप करना उतना ही अधिक कठिन होगा।

दिल्ली के कंसल्टिंग फैमिली फीजिशियन डॉ. राजांशु तिवारी कहते हैं कि अनियंत्रित उच्च रक्तचाप से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है, जिनमें दिल के दौरे, आंखों की बीमारियां, गुर्दो के रोग तथा आघात भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि हाइपरटेंशन प्राइमरी हो सकता है, जो पर्यावरणीय या जेनेटिक कारणों से होता है या यह सकेंडरी भी हो सकता है, जिसके कई कारण होते हैं, जिनमें गुर्दे, वाहिकाओं तथा एंडोक्राइन से जुड़े कारण शामिल होते हैं।

डॉ. तिवारी के मुताबिक, वयस्कों में प्राइमरी या एसेंशियल हाइपरटेंशन होने की संभावना 90-95 प्रतिशत रहती है और बहुत कम रोगियों को (2-10 प्रतिशत) सेकंडरी हाइपरटेंशन होता है।

उन्होंने कहा कि हर किसी के लिए इसकी जानकारी रखना आवश्यक है और लोगों को इस बारे में अवश्यक बताया जाना चाहिए। हाइपरटेंशन एक जीवन र्पयत रहने वाला रोग होता है। अधिकतम नियंत्रण के लिए जीवन-शैली में लंबे समय तक बदलाव लाने और फार्माकोलॉजिक थेरेपी की जरूरत होती है।

डॉ. तिवारी ने बताया कि यदि हाइपरटेंशन की पहचान समय पर हो जाती है तो दिल के दौरे, दिल की बीमारी, स्ट्रोक व किडनी खराब होने के खतरे को कम किया जा सकता है। सभी वयस्कों को अपने रक्तचाप की जांच करनी चाहिए और अपने रक्तचाप स्तरों की जानकारी रखनी चाहिए। डिजिटल रक्तचाप माप करने वाली मशीनें इसे क्लीनिक के बाहर की परिस्थितियों में जानने में मदद करती हैं। यदि हाइपरटेंशन की पहचान होती है, तो लोगों को किसी प्रशिक्षित पेशेवर से सलाह लेनी चाहिए।

--आईएएनएस

 

 

लंदन: महिला के मुकाबले पुरुष में सेक्स के लिए पहल करने की प्रवृत्ति तीन गुनी अधिक होती है। यह बात हालिया शोध में कही गई है।

यह शोध लंबे समय के लिए पुरुष-महिला यौन संबंध पर आधारित है।

शोध के अनुसार, दीर्घकालीन अवधि में लगातार संभोग करने के मामले में कारकों की अहम भूमिका होती है।

जरनल इवोलुसनरी बिहेवियरल साइंसेस में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, संभोग में कई फैक्टर महत्व रखते हैं। जैसे लोग अपने रिश्ते में कितने खुश हैं। वह अपने साथी के साथ कितना जुड़ाव महसूस करते हैं और वह एक दूसरे से कितना प्यार और कितना विश्वास जताते हैं।

नार्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (एनटीएनयू) से ट्रोंड विगो ग्रोंटवे का कहना है कि रिश्ते में जोश व जज्बा होना काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। उन्होंने कहा कि जज्बा ही सभी फैक्टर में सबसे अहम भूमिका निभाता है।

इस स्टडी में 19 से 30 उम्र के ऐसे 92 जोड़े शामिल किए गए थे, जोकि एक महीने से लेकर नौ वर्षो तक एक साथ थे। इन जोड़ों ने एक सप्ताह में औसत दो से तीन बार संभोग किया। जितनी लंबा रिश्ता रहा, इन जोड़ों ने उतना ही कम संभोग किया।

एनटीएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर मोंस बेनडिक्सन ने कहा कि स्टडी में साबित हुआ कि दूसरों के प्रति इच्छा जज्बे को कम करती है। उन्होंने कहा कि अपने साथी के अपेक्षाकृत दूसरों के साथ संभोग की अधिक इच्छा भी रिश्ते में जज्बे को कम करती है।

-- आईएएनएस

 

 

नई दिल्ली: बच्चे के जन्म लेने से लेकर सालों साल परिवार का ख्याल रखने की जिम्मेदारियों के बीच भागती-दौड़ती मांएं सुपरहीरोज होती हैं। सबकी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए वह सिर्फ अपना आराम ही नहीं, बल्कि अपनी सेहत भी कुर्बान कर देती हैं। ऐसे में अब आपकी बारी है कि मां की सेहत का ख्याल रखें। 

मैक्स अस्पताल, साकेत आर्थोपेडिक्स की डायरेक्टर रमणीक महाजन ने कहा कि भारतीय महिलाएं 50 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते घुटने और बोन मास का डिजनरेशन की समस्या से जूझने लगती हैं। भारतीय महिलाओं में आर्थराइटिस के जल्दी होने की वजह पोषक तत्वों की कमी और मोटापा है।

यहां पेश है रमणीक महाजन का सुझाव जिसे अपनाकर माताओं का बेहतर ख्याल रख सकते हैं।

1. जल्द पहचानें चेतावनी संकेत : आपने कई बार अपनी मां को जोड़ों के दर्द, अकड़न को लेकर शिकायत करते हुए और फिर उम्र बढ़ने का संकेत मानकर इसे नजरअंदाज करते हुए देखा होगा। ऐसे में विशेषज्ञ से विचारविमर्श करें। घुटनों में सुबह-सुबह दर्द, अकड़न, लॉकिंग एवं पॉपिंग से शुरुआत होने से लेकर जोड़ों में सूजन होने तक, यह आर्थराइटिस के संकेत हो सकते हैं जोकि एक प्रगतिशील ज्वाइंट स्थिति है। और अधिकतर भारतीय महिलाएं इन संकेतों को नजरअंदाज करती हैं।

2. सही समय पर पहचान : महिलाएं तभी डॉक्टर के पास जाती हैं जब यह स्थिति ऐसे स्टेज में पहुंच जाती है जब दर्द असहनीय हो जाता है। याद रखें कि देरी होने से जोड़ों को होने वाला नुकसान कई गुणा बढ़ा सकता है। यदि इसका शुरुआती चरणों में इलाज हो जाए, तो पारंपरिक उपचारों की मदद से इस स्थिति को बढ़ने में विलंब किया जा सकता है।

3. वजन पर नजर : ओवरवेट होना भारतीय महिलाओं में आर्थराइटिस होने के सबसे प्रमुख जोखिम घटकों में से एक है। हमारे जोड़ कुछ हद तक वजन उठाने के लिए डिजाइन हैं। प्रत्येक 1 किलो अतिरिक्त वजन घुटनों पर चार गुना दबाव डाल सकता है। क्षमता से अधिक वजन जोड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए उचित वजन का मतलब है स्वस्थ जोड़।

4. 30 मिनट की वाक : हर दिन 30 मिनट की वॉक हड्डियों एवं जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हो सकती है।

5. छोटी-मोटी चोटों को गंभीरता से लें : हम जोड़ों के आसपास लगी छोटी-मोटी चोटों को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। इससे हानिकारक स्थितियां पैदा हो सकती हैं। जैसे भविष्य में आर्थराइटिस हो सकता है। यदि दर्द बार-बार हो रहा है तो विशेषज्ञ की सलाह लें। हम अक्सर ऐसे मरीजों को देखते हैं जहां ज्वाइंट इंजरी ज्वाइंट डिजनरेशन का कारण बन जाती हैं।

6. शरीर के पॉश्चर पर रखें नजर : गलत पॉश्चर से जोड़ों, खासतौर से घुटने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। घुटने शरीर में सबसे अधिक भार सहन करने वाले जोड़ हैं। इससे घुटने में दर्द हो सकता है। सही पॉश्चर रखना, काम के दौरान बीच-बीच में ब्रेक लेना, नियमित रूप से स्ट्रेचिंग करना और अपने पॉश्चर को बीच-बीच में ठीक करने से घुटने के दर्द को कम करने में मदद मिलती है।

7. पेनकिलर्स को कहें ना : हमारे देश में खुद से दवाएं लेना एक आम समस्या है। आमतौर पर, हम अक्सर शरीर में दर्द होने पर डॉक्टर से सलाह लिए बिना पेनकिलर्स का सहारा लेते हैं। पेनकिलर्स भले ही हमें दर्द से फौरन राहत दिलाते हैं पर, वह स्थिति का उपचार नहीं करते। इससे कई को-मॉर्बिड स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसलिए यदि आप अपनी मॉम को जोड़ों के दर्द के लिए खुद से पेनकिलर्स लेते हुए देखें, तो फौरन ऑथोर्पेडिस्ट के पास जाकर उनका परीक्षण कराएं।

-- आईएएनएस

नई दिल्ली: सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एसएलई) एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें हालत बिगड़ जाने पर रोग की सक्रियता अलग-अलग चरणों में सामने आती है। इस बीमारी में हृदय, फेफड़े, गुर्दे और मस्तिष्क भी प्रभावित होते हैं और इससे जीवन को खतरा हो सकता है। भारत में इस बीमारी की मौजूदगी प्रति दस लाख लोगों में 30 के बीच होती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं इससे अधिक प्रभावित होती हैं। 

हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल बताते हैं कि एसएलई एक स्व-प्रतिरक्षित अर्थात ऑटो-इम्यून बीमारी है। प्रतिरक्षा प्रणाली को संक्रामक एजेंटों, बैक्टीरिया और बाहरी रोगाणुओं से लड़ने के लिए डिजाइन किया गया है। यही एक तरीका है जिसकी मदद से प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमणों से लड़ती है और एंटीबॉडीज का उत्पादन करती है, जो रोगाणुओं को जोड़ते हैं।

उन्होंने कहा कि ल्यूपस वाले लोग अपने रक्त में असामान्य ऑटोएंटीबॉडीज का उत्पादन करते हैं, जो विदेशी संक्रामक एजेंटों के बजाय शरीर के अपने ही स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर हमला करते हैं। जबकि असामान्य ऑटोइम्यूनिटी का सटीक कारण अज्ञात है, लेकिन यह जीन और पर्यावरणीय कारकों का मिश्रण हो सकता है। सूरज की रोशनी, संक्रमण और एंटी-सीजर दवाओं जैसी कुछ दवाएं एसएलई को ट्रिगर कर सकती हैं।

डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ल्यूपस के लक्षण समय के साथ अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन सामान्य लक्षणों में थकान, जोड़ों में दर्द व सूजन, सिरदर्द, गालों व नाक पर तितली के आकार के दाने, त्वचा पर चकत्ते, बालों का झड़ना, एनीमिया, रक्त के थक्के बनने की प्रवृत्ति में वृद्धि और खराब परिसंचरण प्रमुख हैं। हाथों पर पैरों की उंगलियां ठंड लगने पर सफेद या नीले रंग की हो जाती हैं, जिसे रेनाउड्स फेनोमेनन कहा जाता है।

डॉ. अग्रवाल यह भी कहते हैं कि एसएलई का कोई इलाज नहीं है। हालांकि, उपचार लक्षणों को कम करने या नियंत्रित करने में मदद कर सकता है और गंभीरता के आधार पर भिन्न हो सकता है। सामान्य उपचार विकल्पों में जोड़ों के दर्द और जकड़न के लिए नॉनस्टेरॉइडल एंटी-इनफ्लेमेटरी मेडिसिन (एनसेड्स), चकत्ते के लिए कॉर्टिकोस्टेरॉइड क्रीम, त्वचा और जोड़ों की समस्याओं के लिए एंटीमलेरियल ड्रग्स, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को कम करने के लिए ओरल कॉर्टिकॉस्टिरॉइड्स और इम्यूनोसप्रेसेन्ट ड्रग्स दी जाती हैं।

एसएलई के लक्षणों से निपटने के कुछ उपाय :

- लगातार डॉक्टर के संपर्क में रहें। अपने चिकित्सक के पास नियमित रूप से जाएं। सलाह के अनुसार सभी दवाएं लें। परिवार का पर्याप्त समर्थन मिलना भी जरूरी है।

- ज्यादा आराम के बजाय सक्रिय रहें, क्योंकि यह जोड़ों को लचीला बनाए रखने और हृदय संबंधी जटिलताओं को रोकने में मदद करेगा।

- सूरज के संपर्क में ज्यादा देर तक रहने से बचें, क्योंकि पराबैंगनी किरणें त्वचा के चकत्तों को बढ़ा सकती हैं।

- धूम्रपान से बचें और तनाव व थकान को कम करने की कोशिश करें।

- शरीर के सामान्य वजन और हड्डियों के घनत्व को बनाए रखें।

- ल्यूपस पीड़ित युवा महिलाओं को माहवारी की तिथियों के हिसाब से गर्भधारण की योजना बनानी चाहिए, जब ल्यूपस गतिविधि कम होती है। गर्भावस्था की सावधानीपूर्वक निगरानी की जानी चाहिए और कुछ दवाओं से बचना चाहिए।

--आईएएनएस

 

 

लंदन: यदि आप भी अपने कार्यस्थल पर कुछ कर्मचारियों के अक्सर छुट्टियां लेने से परेशान हो गए हैं तो ऐसे में टीम की संरचना पर गौर फरमाए।

एक बेहद ही रोचक शोध में इस बात का खुलासा किया गया है कि जिस टीम में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं कम होती हैं या नौजवानों की टीम में बुजुर्ग रहते हैं तो वे अपने अन्य सहकर्मियों की अपेक्षा सप्ताह में लगभग दो बार छुट्टियां जरूर लेते हैं। योग्य, कुशल, बुद्धिमान होने के बावजूद वे ऐसा करते हैं।

जर्मनी के कॉन्स्टैंज विश्वविद्यालय के प्रध्यापक फ्लोरियन कुन्ज और मैक्स रेनवल्ड ने कार्यस्थल पर उन कर्मचारियों के व्यवहार का पता लगाया जो कि अपनी टीम में अल्पसंख्यक हैं।

इन दो शोधकर्ताओं ने मिलकर सात साल के दौरान एक बड़ी स्विस-बेस्ड कंपनी में 800 से अधिक टीमों का अवलोकन किया। उन्होंने नए टीम मेंम्बर्स की आयु और वे स्त्री हैं या पुरुष, इस पर अपने ध्यान को केंद्रित किया।

उन्होंने पाया कि पहले किसी टीम का कोई नया सदस्य जितना अधिक असमान होगा, वह भेदभाव वाली स्थितियों को अपने लिए ज्यादा महसूस करेगा या करेगी।

इस तरह की परिस्थितियां आने वाले समय में सब्जेक्ट के टीमवर्क की अवधारणा को आकार देती हैं।

प्रध्यापक फ्लोरियन कुन्ज ने कहा, "कार्यक्षेत्र में महिलाएं या वृद्ध कर्मचारियों को लेकर हमारे मन में पहले से ही कुछ धारणाएं बनी हुई हैं। हम निष्कर्ष के रूप में यह कह सकते हैं कि जहां पुरुषों का वर्चस्व ज्यादा होता है वहां महिलाएं और युवाओं की टीम में वृद्ध, भेदभाव का अनुभव ज्यादा करते हैं और भेदभाव का यह एहसास वक्त के साथ-साथ बढ़ता जाता है।"

शोध के लिए 2,711 लोगों पर अध्ययन किया गया और सबकुछ गुमनाम तरीके से किया गया।

फ्लोरियन कुन्ज और मैक्स रेनवल्ड ने सुझाव दिया, "संख्या में कम होने की वजह से जो कर्मचारी सहज महसूस नहीं करते, उन्हें ज्यादा ध्यान और समर्थन की जरूरत होती है और इन जरूरतों के प्रति टीम लीडर्स को संवेदनशील और हमेशा तैयार रहना चाहिए।"

--आईएएनएस

नई दिल्ली: देश में दांतों की सफाई के मामले में लापरवाही बरतने वालों की संख्या लगभग 4 से 5 प्रतिशत तक पाई गई है। जो लोग तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन नहीं करते हैं, उनमें टूटे दांतों के बीच ठीक से सफाई न होने के कारण मुंह के कैंसर का जोखिम रहता है। मुंह के अंदर त्वचा में लगातार जलन रहने या ऐसे दांतों की वजह से जीभ का कैंसर भी हो सकता है।

आकड़े बताते हैं कि पिछले छह वर्षो में भारत में होंठ और मुंह के कैंसर के मामले दोगुने से अधिक हो गए हैं। हालत को रोकने के लिए खराब दांतों की स्वच्छता, टूटे हुए, तीखे या अनियमित दांतों की ओर ध्यान देना अनिवार्य है।

हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल कहते हैं कि तंबाकू के उपयोग से ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस जैसे घाव हो सकते हैं, जो उपयोगकर्ता को मुंह के कैंसर के जोखिम में डाल सकते हैं। इसके अलावा यह उपयोगकर्ता के मुंह में अन्य संक्रमणों का भी कारण बन सकती है। भारत में, धूम्र-रहित तंबाकू (एसएलटी) का उपयोग तंबाकू से होने वाली बीमारियों का प्रमुख कारण बना हुआ है, जिसमें ओरल कैविटी (मुंह), ईसोफेगस (भोजन नली) और अग्न्याशय का कैंसर शामिल है। एसएलटी न केवल स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, बल्कि भारी आर्थिक बोझ का कारण भी बनता है।

उन्होंने कहा कि ओरल कैंसर के कुछ अन्य जोखिम कारकों में कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, ओरल या अन्य किसी प्रकार के कैंसर का पारिवारिक इतिहास, पुरुष होना, ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) संक्रमण, लंबे समय तक धूप में रहने का जोखिम, आयु, मुंह की स्वच्छता में कमी, खराब आहार या पोषण, आदि शामिल हैं।

डॉ. अग्रवाल ने आगे कहा, "अरेका नट यानी छाली के साथ एसएलटी का उपयोग करना भारत में एक आम बात है और जैसा कि शुरुआत में कहा गया है, सुपारी क्विड और गुटखा, ये दो चीजें एसएलटी के आमतौर पर उपयोग किए जाने वाले रूपों में प्रमुख हैं। एरेका नट को क्लास वन कार्सिनोजेनिक या कैंसरकारी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। साथ ही स्वास्थ्य पर इसके अन्य कई प्रतिकूल प्रभाव भी होते हैं।"

उनके कुछ सुझाव :

-तंबाकू का उपयोग न करें। यदि करते हैं, तो इस आदत को छोड़ने के लिए तत्काल कदम उठाएं।

-शराब का सेवन सीमित मात्रा में ही करें।

-धूप में लंबे समय तक न रहें, धूप में जाने से पहले 30 या उससे अधिक एसपीएफ वाले लिप बाम का उपयोग करें।

-जंक और प्रोसेस्ड फूड के सेवन से बचें या इसे सीमित करते हुए, बहुत सारे ताजे फल और सब्जियों सहित स्वस्थ आहार का सेवन करें।

-शॉर्ट-एक्टिंग निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी जैसे कि लोजेंज, निकोटीन गम आदि लेने की कोशिश करें।

-उन ट्रिगर्स को पहचानें, जो आपको धूम्रपान करने के लिए उकसाते हंै। इनसे बचने या इनके विकल्प अपनाने की योजना बनाएं।

-तंबाकू के बजाय शुगरलैस गम, हार्ड कैंडी, कच्ची गाजर, अजवाइन, नट्स या सूरजमुखी के बीज चबाएं।

-सक्रिय रहें। शारीरिक गतिविधि को तेज रखने के लिए बार-बार सीढ़ियों से ऊपर-नीचे जाएं, ताकि तंबाकू की तलब से बच सकें।

--आईएएनएस

न्यूयॉर्क: उम्र के साथ-साथ याददाश्त कम होने लगती है। ऐसे रात में अच्छी नींद लेने से दिन भर मूड ठीक रहता है और इसकी की मदद से बुढ़ापे में याददाश्त को तेज रखा जा सकता है। एक शोध में इस बात का खुलासा किया गया है।

इंटरनेशनल न्यूरोसाइकोलॉजिकल सोसाइटी के जर्नल में इस अध्ययन को प्रकाशित किया गया है जिसमें यह बात कही गई है कि उचित मात्रा में नींद न लेने से या गहरी नींद न होने से हमारा मूड दिन भर उखड़ा-उखड़ा सा रहता है जिससे आगे चलकर वृद्धावस्था में पुराने किसी घटना को याद रखने की संभावना कम हो जाती है।

कार्य स्मृति और तीन स्वास्थ्य संबंधी कारक जैसे कि नींद, उम्र और डिप्रेस्ड मूड के बीच शोधकर्ताओं ने गहरा संबंध पाया।

कार्य स्मृति, अल्पकालिक स्मृति का एक हिस्सा है जो संज्ञानात्मक कार्यो जैसे कि सीखने, तर्क करने और समझने के लिए आवश्यक जानकरियों को अस्थायी रूप से संग्रहित कर उन्हें व्यवस्थित रखती है।

हम किसी चीज का विकास किस तरह से करते हैं, उसका उपयोग कैसे करते हैं और सूचनाओं को किस तरीके से याद रखते हैं, इन सभी में कार्य स्मृति एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक वीवेई झांग ने कहा, "अन्य शोधकर्ताओं द्वारा पहले से ही इनमें से हर एक कारक को दिमाग की सम्पूर्ण कार्य प्रणाली से जोड़कर देखा जा चुका है, लेकिन हमारे काम ने इस विषय पर प्रकाश डाला है कि किस तरह से ये सभी कारक, स्मृति की गुणवत्ता और मात्रा से संबंधित है और ऐसा पहली बार किया गया है।"

झांग ने यह भी कहा, "ये तीनों कारक एक-दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं। उदाहरण के तौर पर, युवाओं की तुलना में वृद्ध व्यक्तियों में नेगेटिव मूड को अनुभव करने की संभावना ज्यादा रहती है। नींद की खराब गुणवत्ता भी अकसर डिप्रेस्ड मूड से संबंधित रहती है।"

शोधकर्ताओं ने दो अध्ययन किए। पहले में, 110 कॉलेज स्टूडेंट्स से स्वयं उनके द्वारा बताए गए नींद की क्वालिटी और डिप्रेस्ड मूड और कार्य स्मृति के प्रयोगात्मक उपायों से उनके संबंध, इन सारी चीजों के नमूने लिए गए।

दूसरे में, 21 से 77 वर्षो के बीच 31 सदस्यों के नमूने लिए गए। इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने उम्र और कार्य स्मृति से उनके संबंध की छानबीन की।

इन शोधकर्ताओं ने पहली बार कार्य स्मृति की गुणवत्ता और मात्रा पर इन तीन कारकों के प्रभाव को सांख्यिकीय रूप से अलग किया है।

शोध के इस निष्कर्ष से कार्य स्मृति पर इन तीन कारकों के प्रभाव को कम करने के लिए भविष्य में इससे बचने के उपाय या उपचारों की खोज की जा सकती है।

--आईएएनएस

 

 

न्यूयॉर्क: माता-पिता ध्यान दें, जो किशोर ऑनलाइन बुलिंग (बदमाशी) के शिकार होते हैं उन्हें कम नींद और डिप्रेशन (अवसाद) का सामना करना पड़ता है। एक अध्ययन ने इस बात को लेकर चेताया है।

साइबर शिकार और नींद की गुणवत्ता के बीच संबंध का पता लगाने के लिए कुछ अध्ययनों में से एक में बफेलो विश्वविद्यालय की अनुसंधान टीम ने 800 से अधिक किशोरों के बीच ऑनलाइन बुलिंग और अवसाद के बीच संबंधों की जांच की।

बफेलो विश्वविद्यालय से पीएचडी के छात्र मिशोल क्वोन ने कहा, "इंटरनेट और सोशल मीडिया पर साइबर उत्पीड़न सहकर्मी उत्पीड़न और किशोरों के बीच एक उभरती मानसिक स्वास्थ्य चिंता का एक अनूठा रूप है।"

क्वोन ने कहा कि 15 प्रतिशत अमेरिकी हाई स्कूलों के छात्रों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से तंग किया जाता है।

गंभीर स्तर पर स्कूल में प्रदर्शन से लेकर, रिश्तों में दूरियां और यहां तक की आत्महत्या का कारण भी डिप्रेशन बन सकता है।

अमेरिका के किशोर स्वास्थ्य के कार्यालय के अनुसार, लगभग एक तिहाई किशोरों में अवसाद के लक्षण अनुभव हुए हैं, जिनमें नींद के पैटर्न में बदलाव के अलावा, लगातार चिड़चिड़ापन, क्रोध और सामाज से कटाव शामिल हैं।

8 से 12 जून तक टेक्सास में 'एसएलईईपी 2019' सम्मेलन में अध्ययन को प्रस्तुत किया जाएगा।

--आईएएनएस

नई दिल्ली: अगर आप गर्मियों की छुट्टी की योजना बना रही हैं और आप तय नहीं कर पा रही हैं कि मेकअप बैग में क्या-क्या डालना है? तो विशेषज्ञों की माने तो आपको बैग में क्लींजर, टोनर और मॉस्चुराईजर के साथ-साथ ब्लॉटिंग पेपर रखने की जरूरत है।

ब्लॉटिंग पेपर से त्वचा अत्यधिक तैलीय होने पर आप उसे साफ कर सकती हैं।

मेकअप डिजायनरी, भारत की शिक्षा प्रमुख और द बाल्म कॉस्मेटिक्स, भारत की मेकअप विशेषज्ञ सबा खान ने गर्मियों की यात्रा में किन चीजों को अपने साथ रखें, इस बारे में बताया है।

- पहला, आप एक अच्छे क्लींजर, टॉनर और मॉस्चुराईजर से शुरुआत कर सकते हैं। इसके बाद जेल-सन्सक्रीम का प्रयोग करें, जो रोमछिद्रों को बंद न करें और चेहरे पर हल्का महसूस हो।

- अपने त्वचा के अनुसार अच्छा प्राइमर का प्रयोग करें। इसके साथ ही इन प्रोडक्ट्स को चेहरे पर अवशोषित होने दें, ताकि मेकअप ढले न। फिर सही शेड के कंसीलर से आंखों के नीचे के धब्बों को ढकें।

- इसके बाद मैट फिनिस फाउंडेशन को स्पॉन्ज की सहायता से चेहरे पर लगाए। यह तरीका तैलीय त्वचा के लिए कारगार है। इसके बाद इसे सेट करने के लिए लूज पाउडर का प्रयोग करें।

- फिर नेचुरल कलर का ब्लशर लगाए और ब्रॉ-पेंसिल से भौंहों को सही आकार दें। आंखों के लिए जेल ब्राउन पेंसिल चुनें।

- चेहरे पर निखार लाने के लिए हाइलाईटर से चिकबॉन्स को हाइलाईट करें। फिर वाटरप्रूफ मस्कारा और न्यूड शेड की लिप कलर से अपने लुक को पूरा करें।

- भौंहों को पूरे दिन सेट करने के लिए बढिया मस्कारा को प्रयोग में लाए।

- वहीं अगर कई सारे प्रोडक्ट्स के बिना पूरे दिन चेहरे को धूप से बचाकर व हाईड्रेट रखना है तो एसपीएफ युक्त फाउंडेशन का प्रयोग करें, इससे आपको चेहरे पर भारीपन महसूस नहीं होगा।

- एक सेमी-मेट न्यूड गुलाबी लिपस्टिक का इस्तेमाल आप लिपस्टिक के अलावा क्रीम ब्लश, आईशैडो के तौर पर भी कर सकती हैं।

- इसके साथ ही लिपस्टिक को लंबे समय तक सेट करने के लिए पहले हल्का फाउंडेशन या पाउडर लगाने के बाद लिप-पेंसिल व लिपस्टिक लगाए और फिर से हल्का पाउडर लगाने के बाद दूबारा लिपस्टिक लगाए।

--आईएएनएस

नई दिल्ली: अस्थमा (दमा) फेफड़ों की वायु नलिकाओं में सूजन के कारण होता है, जिसमें बार-बार घरघराहट और सांस फूलती है। अस्थमा का सबसे प्रमुख कारण परिवार में अस्थमा का इतिहास होना भी है। हालांकि, वायु प्रदूषण, घरेलू एलर्जी जैसे बिस्तर में खटमल, स्टफ्ड फर्नीचर, तंबाकू का धुआं और रासायनिक पदार्थ अस्थमा के प्रमुख कारकों में शामिल हैं।

विभिन्न वजहों से होने वाले अस्थमा के भी कई प्रकार होते हैं जैसे एडल्ट ऑनसेट अस्थमा, एलर्जिक ऑक्यूपेशनल अस्थमा, व्यायाम से होने वाला अस्थमा और गंभीर (सीवियर) अस्थमा इत्यादि। पुराने अस्थमा का अमूमन निरंतर दवाओं द्वारा इलाज किया जाता है। लेकिन गंभीर लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए अधिक उन्नत उपचार की आवश्यकता होती है। अस्थमा से ग्रसित लोगों की कुल आबादी में गंभीर अस्थमा से ग्रस्त लोग तकरीबन 8-10 प्रतिशत है।

दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं। भारत में वायु प्रदूषण ने स्वास्थ्य संकट को जन्म दिया है। इस मामले में, भारत में अस्थमा कुल जनसंख्या के लगभग 15 से 20 प्रतिशत लोगों यानी तकरीबन 3 करोड़ लोगों पर असर डाल रहा है। आने वाले वर्षों में, बढ़ते प्रदूषण का स्तर इस संख्या को सैकड़ों-लाखों में बढ़ा सकता है।

नोएडा स्थित मेट्रो रेस्पिरेटरी सेंटर के वरिष्ठ सलाहकार और चेयरमैन डॉ. दीपक तलवार कहते हैं, "जिन लोगों को इनहेलर्स लेने के बावजूद 1-2 महीने तक घरघराहट या खांसी आती रहती है, वे गंभीर अस्थमा की श्रेणी में आते हैं। जो मरीज अस्थमा को नियंत्रित करने के लिए वर्ष में दो बार से अधिक ओरल स्टेरॉयड लेते हैं वे भी अस्थमा की गंभीर श्रेणी में आते हैं और अंतर्निहित सूजन को नियंत्रित करने के लिए लंबे समय तक रोज दवा की आवश्यकता होती है।"

उन्होंने कहा कि अगर मानक उपचार रोगी के लक्षणों को लगभग 3 से 6 महीने तक नियंत्रित करने में विफल रहता है, तो इसे एक गंभीर अस्थमा का मामला माना जाता है। उन्हें ब्रोन्कियल थर्मोप्लास्टी जैसे चिकित्सकीय हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।

डॉ. तलवार के मुताबिक, अच्छी खबर यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं में नवाचारों ने उन रोगियों के लिए गंभीर अस्थमा के लक्षणों का उपचार करना आसान बना दिया है जो लंबे समय से दवाओं पर भरोसा करते आए हैं। इस क्षेत्र में एक अग्रणी आविष्कार, ब्रोन्कियल थर्मोप्लास्टी गंभीर अस्थमा से पीड़ित लोगों के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्पों में से एक के रूप में उभरी है, जो कि अधिकतम चिकित्सा उपचार के बावजूद अस्थमा के लक्षणों से ग्रस्त हैं।

उन्होंने कहा कि सामान्य श्वास के साथ, फेफड़ों के वायुमार्ग पूरी तरह से खुले होते हैं। गंभीर अस्थमा वाले लोगों में वायुमार्ग की अत्यधिक चिकनी मांसपेशियां होती हैं जो उनके वायुमार्ग की परिक्रमा करती हैं। वायुमार्ग की सूजन के साथ यह अतिरिक्त मांसपेशी वायुमार्ग की दीवारों को मोटा बनाने के लिए जुड़ जाती हैं। अस्थमा के दौरे के दौरान, वायुमार्ग की चिकनी मांसपेशी सिकुड़ जाती है, जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है।

डॉ. तलवार कहते हैं कि ब्रोन्कियल थर्मोप्लास्टी के दौरान, एक छोटी लचीली ट्यूब को मुंह या नाक के माध्यम से रखे गए एक मानक लचीले ब्रोन्कोस्कोप के माध्यम से वायुमार्ग में लगाया जाता है। उपचार वायुमार्ग की दीवारों को नियंत्रित तापीय ऊर्जा प्रदान करके वायुमार्ग में स्मूद मसल मास को कम करता है। यह तीन ब्रोंकोस्कोपी में किया जाता है।

उन्होंने कहा कि यह थेरेपी लगभग 80 प्रतिशत तक मांसपेशियों को सामान्य आकार में लाने में सहायक होती है। मांसपेशियों के आकार में कमी का उन रोगियों पर अंतर्निहित प्रभाव पड़ता है जो दवा पर निर्भर हैं, क्योंकि यह अधिक प्रभावी हो जाता है और वायुमार्ग थोड़ा अधिक खुल जाता है। यह अस्थमा के दौरे के दौरान दीवार की संकुचन और संकीर्ण होने की क्षमता को कम करता है। पिछल कई वर्षों में, ब्रोन्कियल थर्मोप्लास्टी ने गंभीर अस्थमा रोगियों को उनकी स्थिति को बेहतर ढंग से उपचारित करने में मदद की है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है।

डॉ. तलवार कहते हैं कि अस्थमा के तमाम उपचार सामने आए हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवा प्रदाता शायद ही कभी उनका उपयोग करते हैं या उनके बारे में जानते हैं। अफसोस की बात यह है कि बीटी जैसे उपचार दुनिया भर में जीवन बदल रहे हैं, लेकिन भारत में उनके बारे में बहुत कम जानकारी है। परिणामों में पर्याप्त सुधार के लिए एक नए नजरिये की आवश्यकता है।

--आईएएनएस