'अपने पैरों पर खड़ी' लकवाग्रस्त नसीमा हुर्जुक का शुक्रिया
Sunday, 13 October 2019 17:43

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कोल्हापुर/सिंधुदुर्ग: नसीमा मोहम्मद अमीन हुजुर्क (69) की किस्मत ने उन्हें किशोरावस्था में ही व्हीलचेयर का सहारा लेने के लिए मजबूर कर दिया था। उनकी जिंदगी की कहानी संघर्ष और धैर्य का प्रतीक हैं, जिन्होंने अपने जैसे कई और लोगों को 'अपने पैरों पर खड़े होने' और जीवन को गर्व के साथ अपनाने और चुनौतियों का सामना करने में मदद की है।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर में स्थित हेल्पर्स ऑफ द हैंडिकैप्ड कोल्हापुर (एचओएचके-1984) की संस्थापक व अध्यक्ष नसीमा को लोग नसीमा दीदी के नाम से जानते हैं। उन्होंने बीते 35 सालों में पैराप्लेजिया से पीड़ित 13,000 से अधिक लड़के और लड़कियों का पुनर्वास कराने के साथ ही शारीरिक तौर पर अक्षम हजारों लोगों के लिए सेवा उपलब्ध कराया।

किशोरावस्था की उम्र में नसीमा खुद एक सफल एथलीट बनने की महत्वाकांक्षा रखती थी, लेकिन उनका यह सपना तब टूट गया जब उनके जीवन में पैराप्लेजिया ने दस्तक दी। 17 साल की उम्र के दौरान नसीमा हर्जुक चलने फिरने में असमर्थ हो गईं। पैराप्लेजिया एक ऐसा मर्ज है, जिसमें व्यक्ति के दोनों पैर आंशिक रूप से या पूरी तरह या शरीर के कूल्हे से नीचे से लकवाग्रस्त हो जाते हैं। यह रोग व्यक्ति के स्पाइन कोर्ड को काफी नुकसान पहुंचाता है।

सिंधुदुर्ग स्थित अपने घर से नसीमा ने आईएएनएस को बताया, "मैं न सिर्फ पढ़ाई में अच्छी थी, बल्कि एक सामाजिक, चंचल, खेलकूद में आगे रहने वाली लड़की थी, लेकिन एक दिन मेरा एथलीट बनने का सपना चकनाचूर हो गया।"

उनके छोटे भाई अजीज हुर्जुक ने उन काले दिनों को याद करते हुए बताया, "वह खुद को लेकर काफी शर्मिदा महसूस करती थी, क्योंकि उसे शौचालय जाने के लिए भी किसी की सहायता लेनी पड़ती थी। वह करीब तीन साल तक लोगों को अनदेखा करती रही और ऊपरवाले से अपनी दयनीय जिंदगी खत्म करने के लिए दुआ करती रही।"

छह महीने बाद उनके परिवार पर एक और आपत्ति आन पड़ी जब उनके पिता की अचानक मृत्यु हो गई।

इसी दौरान वह एक स्थानीय व्यापारी दिवंगत एन. डी 'बाबूकाका' दीवान से मिली, जो खुद एक पैराप्लेजिक थे, लेकिन वह अपनी जिंदगी जिंदादिली से जीते थे, अपने लिए खास तैयार कार को भी खुद चलाते थे, यहां तक की देश-विदेश में का सफर भी खुद ही कर आते थे। वृद्ध दीवान बेंगलुरू स्थित द एसोसिएशन ऑफ पीपल विद डिसेबिलिटी (एपीडी) के संस्थापकों में से एक थे।

उन्हें लेकर नसीमा ने कहा, "वह बाबूकाका ही थे, जिन्होंने मेरी चुप्पी सुनी, मुझे सांत्वना दिया और मेरे दिमाग में भरे जहर को बाहर निकाला और मुझे अपने लिए और मेरे जैसे बाकी लोगों के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया।"

उनसे प्रेरित होने के बाद ही नसीमा अपने व्यक्तिगत नर्क से बाहर आईं। अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की और शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर (एसयूके) से स्नातक की डिग्री हासिल की। अपने दम पर उन्होंने सेंट्रल एक्साइज एंड कस्टम्स विभाग में नौकरी प्राप्त की और समर्पण और कड़ी मेहनत के दम पर वह डिप्टी सुपरिंटेंडेंट के पद तक पहुंच गई।

उन्होंने याद करते हुए कहा, "उस दौरान विकलांग बच्चों की हर तरह की मदद के लिए मैं अपना लगभग पूरा वेतन दान कर देती थी, लेकिन वह हमेशा कम पड़ जाता था। मैं हर विकलांग के लिए स्वतंत्र जीवन और सेवानिवृत्ति के बाद पूर्ण पुनर्वास जैसा कुछ करना चाहती थी, लेकिन ये कैसे करूं मुझे इसकी जानकारी नहीं थी।"

इसी बीच एक बार फिर से बाबूकाका ने सहायता की, उन्होंने विकलांगों की मदद के लिए कोल्हापुर में 'पंग पुनर्वासन संस्थान' की नींव रखी, और अपनी स्थाई सरकारी नौकरी से वीआरएस ले लिया।

यह संस्था पैराप्लेजिक्स लोगों के लिए मक्का बन गया। यहां राज्य के या राज्य के बाहर से आए हर पैराप्लेजिक्सों को पनाह मिलता था।

साल 1984 में नसीमा ने एक विकलांग महिला रजनी करकरे, कागल साम्राज्य के वंश, विजयादेवी घाटगे और उनकी बहू सुहासिनी देवी घाटगे की मदद से हेल्पर्स ऑफ द हैंडिकैप्ड कोल्हापुर (एचओएचके) की स्थापना करने का निर्णय लिया।

एचओएचके के ट्रस्टी पी.डी. देशपांडेय ने कहा, " शुरुआती अवस्था में पैराप्लेजिया का पता लगाना पीड़ित के भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण था, उन्होंने कैच-एम यंग नारे के साथ शुरुआत की। इसके साथ में उनके गहरे मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक परेशानियों को भी दूर किया गया, जो हर पीड़ित अपने साथ लाता था और उन्होंने स्वतंत्र बनाने और अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए प्रयास किया गया।"

35 सालों के सफर को देखते हुए नसीमा को एचओएचके के विकास को देख कर संतुष्टि होती है कि कई लोग जिनकी दुनिया व्हीलचेयर तक सीमित हो गई थी, जो उनके पास मदद के लिए आए वे अब आजाद सांस लेने लगे हैं।

मूलरूप से कोल्हापुर नगर निगम से छात्रावास के लिए ली गई पट्टे पर एक इमारत अब उन विकलांगों के लिए कार्यशाला बन गई है, जो अपनी पढ़ाई छोड़ चुके हैं। यहां 10 विकलांग कर्मचारी काम करते हैं।

वहीं नसीमा ने अपना ड्रीम प्रोजेक्ट 'स्वप्न नगरी' (या ड्रीम टाउन)की नींव साल 2000 में रखी। इसके लिए मंगाओकर परिवार द्वारा सिंधुदुर्ग नदी के किनारे दी गई उपहार स्वरूप 12 एकड़ जमीन का उपयोग किया गया।

इस बारे में नसीमा ने कहा, "पहले यह जमीन तीन तरह से नदी से घिरी एक बंजर भूमि थी, लेकिन विभिन्न सरकारी और अन्य संगठनों की मदद से हमने काजू प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना की, ताकि इससे कुछ आय हो सके। यहां 100 अन्य कर्मचारियों के साथ करीब 50 विकलांग व्यक्ति रहते हैं।"

55 सालों की अपनी व्हीलचेयर की यात्रा को याद करते हुए नसीमा को अपने पिता के शब्द याद आते हैं, जो थे, "खुद को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से पूछे, बता तेरी रजा क्या है।"

--आईएएनएस

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