दवाओं का घरेलू उत्पादन बढ़ाने की तैयारी, कैंसर और मधुमेह जैसी दवाओं पर पड़ेगा असर

कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़ी दवाओं के घरेलू उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए इन दवाओं के आयात को सरकार महंगा करने की तैयारी में है। जिसके तहत महंगी विदेशी दवाओं के आयात के लिए जरूरी लाइसेंस व पंजीकरण शुल्क को सरकार 50 गुना तक बढ़ा सकती है। सरकार की दलील है कि सस्ती दरों पर इन दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए सरकार शुल्क बढ़ाएगी और शुल्क बढ़ने की वजह से विदेशी दवा निर्माता कंपनियां घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देंगे और यह दवाएं लोगों को सस्ती मिल सकेंगी। घरेलू उत्पादन बढ़ने से दवाओं का उत्पादन खर्च कम होगा तो यह लोगों को सस्ती मिलेंगी।

जानकारों का कहना है कि अभी हृदय रोग, मधुमेह व कैंसर की अधिकतर दवाएं विदेश से आयात होती हैं। जिससे इनका कुल खर्च एकदम से बढ़ जाता है। जिसका बोझ सीधे मरीजों पर डालते हुए कंपनियां ऊंची दर पर दवाएं बेचती हैं। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक यह दवाएं आयात शुल्क बढ़ने से एकदम और महंगी हो सकती हैं। जिससे लोगों की खरीद से बाहर होने का खतरा रहेगा क्योंकि खबर है कि आयात शुल्क अलग-अलग मदों में 50 गुना तक बढ़ सकता है। इस तरह से आयात करने की बजाय कंपनियां भारत में ही दवाएं बनाने को विवश होंगी। भारत अपनी कुल जरूरत का करीब नौ फीसद दवा आयात करता है। इस तरह देश में हर साल करीब 10 हजार करोड़ रुपए कीमत तक की दवाएं आयात की जाती हैं।

आयात शुल्क व लाइसेंस पंजीकरण शुल्क एकमुश्त बढ़ने से विदेशी दवा निर्माताओं के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। इस फैसले को लागू करने से पहले दवा निर्माताओं से भी सरकार सुझाव लेगी। क्योंकि दूसरे तमाम देशों में यह दोनों शुल्क पहले से ही कई गुना अधिक है। मंत्रालय का कहना है कि फैसले के पीछे एक वजह जहां महंगी विदेशी दवाओं को सस्ता करना है वहीं पेटेंट दवाओं के घरेलू उत्पादन को भी बढ़ावा देना है। साथ ही किसी देश या दवा कंपनियों का एकाधिकार खत्म करना और जटिल बीमारियों की दवाओं के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाना भी इसका मकसद है। सरकार का यह कदम कूटनीतिक सामरिक लिहाज से भी अहम बताया जा रहा है।

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