जानिए राफेल डील में अनिल अंबानी की फर्म को क्यों दसॉल्ट ने चुनाः सूत्र

दुनिया में रक्षा निर्माण क्षेत्र की प्रमुख कंपनी  दसॉल्ट ने राफेल डील में आखिर अनिल अंबानी की कंपनी को क्यों चुना. वो भी तब, जब इस कंपनी की माली हालत अच्छी नहीं रही. यह सवाल हर किसी के जेहन में उठ रहा है. इन सवालों का जब जवाब जानने की एनडीटीवी ने कोशिश ती दसॉल्ट के सूत्रों ने अपने तर्क दिए.  कंपनी सूत्रों ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि अनिल अंबानी की फर्म को इसलिए चुना,  क्योंकि यह मिनिस्ट्री ऑफ कारपोरेट अफेयर्स में रजिस्टर्ड है, साथ ही नागपुर में जमीन है, जिससे रनवे की सुविधा भी मिलेगी. हालांकि दसॉल्ट के इन तर्कों से विपक्षी कांग्रेस के राफेल डील को लेकर सरकार पर किए जा रहे हमलों मे कमी आइएगी, ऐसी संभावना नहीं है. 

विपक्ष का आरोप है कि 37 राफेल विमानों की खरीद के लिए  8.6 बिलियन डॉलर के सौदे की डील में गड़बड़ी हुई. यह डील व्यक्तिगत बातचीत के दौरान फाइनल हुई, जिसमें  क्रॉनी कैपिटलिज्म का खेल हुआ और अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने की कोशिश हुई. फ्रांस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में राफेल सौदे की घोषणा की थी. कई महीने से विपक्षी कांग्रेस  मोदी सरकार पर गलत ढंग से राफेल डील करने की बात उठाकर हमला बोलती रही है.दावा है कि मोदी सरकार ने प्लेन खरीद में न केवल अधिक भुगतान की व्यवस्था की बल्कि डील में पारदर्शिता भी नहीं रही. उधर सरकार इन आरोपों पर पलटवार करते हुए कह रही है कि कांग्रेस बिना किसी सुबूत के आरोप लगा रही है. सरकार बता रही है कि राफेल डील तो यूपीए सरकार के वक्त ही शुरु हुई. 

पिछले हफ्ते विपक्षी कांग्रेस के हाथ बड़ा हथियार लगा, जब पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का एक बयान सामने आया, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति ने कहा था कि भारत सरकार के प्रस्ताव पर ही रिलायंस को पार्टनर बनाया गया, इसके अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. हालांकि एक दिन बाद उन्होंने कहा, "यह डसॉल्ट से पूछा जाना चाहिए क्या उस पर ऑफेसट पार्टनर के रूप में रिलायंस को पार्टनर बनाने का दबाव था." कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक दसॉल्ट को कुल कीमत का 50 प्रतिशत यानी 30 हजार करोड़ रुपये का निवेश रक्षा क्षेत्र में करना होगा. उधर, दसॉल्ट ने जोर देकर कहा है कि वह अनिल अंबानी को चुनने को लेकर कतई प्रभावित नहीं था. एनडीटीवी को सूत्रों ने बताया कि जब बड़े भाई मुकेश अंबानी से रिलायंस की डिफेंस कंपनी की बागडोर अनिल अंबानी के हाथ में आ गई तो तो फिर डसॉल्ट से बातचीत शुरू हुई थी.

वर्ष 2015 में बेंगलुरु में आयोजित हुए एयर शो के दौरान दसॉल्ट और अनिल अंबानी की कंपनी के बीच संयुक्त उद्यम(ज्वाइंट वेंचर) की योजना बनी. खास बात है कि इसके  दो महीने बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से राफेल सौदे की घोषणा होनी थी. यूं तो  मनमोहन सरकार में यह  राफेल डील शुरू हुई और पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल इसमें मजबूत भूमिका में रही. कुल 108 विमानों के निर्माण के लिए एचएएल की भूमिका तय की गई. उस वक्त मुकेश अंबानी की फर्म भी पार्टनर थी, मगर मुकेश अंबानी की फर्म की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी, दसॉल्ट सूत्रों के मुताबिक 2012 से  मुकेश अंबानी की फर्म से बातचीत शुरू हुई, बाद में उनके छोटे भाई अनिल अंबानी के हाथ कंपनी आ गई. एक और बात है. 39 राफेल विमानों की खरीद से ठीक 17 दिन पहले राफेल की मूल कंपनी दसॉल्ट के बॉस का एक बयान भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह एचएएल के साथ पार्टनरशिप करने की तैयारी में हैं. दसॉल्ट के चेयरमैन Eric Trappier का संबंधित वीडियो कांग्रेस सोशल मीडिया पर जारी कर चुकी है.जिसके जरिए कांग्रेस ने मोदी सरकार पर एचएएल को किनारे कर अनिल अंबानी का डील में पक्ष लेने का आरोप लगाया. बहरहाल, राफेल सौदे का बचाव करने वाले लोग तर्क देते हैं  कि एचएएल ने खुद को रेस से बाहर कर लिया क्योंकि विमानों के निर्माण के लिए आवश्यक समय और मानव संसाधन की आवश्यकता अधिक थी.