दहेज उत्पीड़न कानून में SC ने फिर किया बदलाव, अब जांच अधिकारी करेगा गिरफ्तारी का फैसला

दहेज उत्पीड़न की शिकायतों पर तुरंत गिरफ्तारी रोकने वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बदलाव किया है. अब शिकायतों को समीक्षा के लिए फैमिली वेलफेयर कमिटी के पास नहीं भेजा जाएगा. हालांकि, इसका मतलब ये नहीं कि शिकायत दर्ज होते ही आरोपियों की गिरफ्तारी अब ज़रूरी हो गयी है. कोर्ट ने इसे जांच अधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया है. पुराने फैसले में दी गयी कई और रियायतों को भी बरकरार रखा गया है.

क्या था पुराना फैसला

पिछले साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने IPC 498A यानी दहेज उत्पीड़न के मामलों में बेवजह गिरफ्तारी और ज़मानत न मिलने को देखते हुए कई दिशा निर्देश जारी किए थे. कोर्ट ने कहा था:-

*देश के हर ज़िले में फैमिली वेलफेयर कमिटी का गठन किया जाए. इसमें सामाजिक कार्यकर्ता और दूसरे योग्य लोग हों.

*498A की शिकायतों को पहले कमिटी के पास भेजा जाए. कमिटी मामले से जुड़े पक्षों से बात कर सच्चाई समझने की कोशिश करे.
* कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर ही गिरफ्तारी का फैसला हो. बेहद ज़रूरी स्थितियों में ही रिपोर्ट आने से पहले गिरफ्तारी हो सकती है.
* हर राज्य 498A के मामलों की जांच के लिए जांच अधिकारी तय करे. इन अधिकारियों को उचित ट्रेनिंग दी जाए.
* जिन लोगों के खिलाफ शिकायत है. पुलिस उन सबकी भूमिका की अलग-अलग समीक्षा करे. सिर्फ एक शिकायत के आधार पर सबको गिरफ्तार न किया जाए.
* जिस शहर में मुकदमा चल रहा है, उससे बाहर रहने वाले लोगों को हर तारीख पर पेशी से छूट दी जाए. मुकदमे के दौरान परिवार के हर सदस्य की पेशी अनिवार्य न रखी जाए.
*अगर डिस्ट्रिक्ट जज सही समझें तो एक ही वैवाहिक विवाद से जुड़े सभी मामलों को एक साथ जोड़ सकते हैं.
*भारत से बाहर रह रहे लोगों का पासपोर्ट जब्त करने या रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने जैसी कार्रवाई बहुत ज़रूरी हालात में ही की जाए.
*वैवाहिक विवाद में अगर दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है तो ज़िला जज आपराधिक मामले को बंद करने पर विचार कर सकते हैं.

बदला हुआ फैसला क्या है

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने 2 जजों की बेंच में बदलाव किया है. इसके मुताबिक:-

*कानून में नया प्रावधान जोड़ना कोर्ट का काम नहीं. इसलिए, फैमिली वेलफेयर कमिटी के गठन का आदेश निरस्त किया जा रहा है.

*इसका मतलब ये हुआ कि अब शिकायतों को समीक्षा के लिए किसी कमिटी के पास नहीं भेजा जाएगा.
*दहेज उत्पीड़न के मामलों को देखने के लिए पुलिस अधिकारी को प्रशिक्षण दिया जाए. ट्रेनिंग पाए अधिकारी को ही जांच सौंपी जाए.
*जांच अधिकारी आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी को लेकर जोगिंदर कुमार, डी के बसु, ललिता कुमारी और अरनेश कुमार मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पालन करें.

इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने जहां संज्ञेय अपराध के लिए तुरंत FIR की बात कही थी. लेकिन गिरफ्तारी ज़रूरी होने पर ही करने को कहा था. इसका मतलब ये हुआ कि अब पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी तभी करेगा, जब ऐसा करना ज़रूरी हो

*व्यक्तिगत पेशी से छूट या सभी मुकदमों की एक साथ सुनवाई के लिए कोर्ट में CrPC 205 और 317 के प्रावधान के तहत कोर्ट में आवेदन दिया जा सकता है.

*पासपोर्ट जब्ती या रेड कॉर्नर नोटिस जैसी कार्रवाई रूटीन में नहीं हो सकती. ज़रूरी होने पर ही ऐसा किया जाए.
*मुख्य वैवाहिक विवाद में समझौता होने पर बाकी मुकदमों को खत्म करने के लिए CrPC 482 के तहत हाई कोर्ट में आवेदन दिया जा सकता है

कानून के दुरुपयोग से समाज को नुकसान

सुप्रीम कोर्ट ने नए फैसले में कहा है कि विशेष परिस्थितियों के लिए बने कानून का कुछ लोग लाभ उठाने की कोशिश करते हैं. महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए कानून में जोड़े गए 498A का शिकार कई बार बेगुनाह रिश्तेदार होते हैं. गुस्से या बदले की भावना से युवा, बुजुर्ग या दूर रहने वाले ऐसे रिश्तेदारों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज करा दिया जाता है, जिनका पूरे विवाद से कोई लेना-देना नहीं होता.

कोर्ट ने माना है कि ऐसा करना न सिर्फ बहुत क्रूर है, बल्कि ये सामाजिक ढांचे को भी नुकसान पहुंचाता है. पुलिस या अदालतों को इसे लेकर संवेदनशील होना चाहिए. कोर्ट के पास अधिकार है कि ज़रूरी हालात में लोगों को अग्रिम ज़मानत दे.

--आईएएनएस

 

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