Happy Birth Day Rajnath Singh: कहानी राजनाथ सिंह कीः बीजेपी सरकार पर संकट मंडराया तो करा दी बसपा-कांग्रेस में फूट

चंदौली के भभोरा गांव के उस युवा ने यूं तो पढ़ाई के दौरान ही राजनीति शुरू कर दी थी, मगर यह नहीं सोचा था कि एक दिन वह सियासत का सितारा बनेगा। देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री से लेकर देश के गृहमंत्री की कुर्सी भी उसका एक दिन इंतजार करेगी।गोरखपुर यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में एमएससी करने के बाद उस युवा को लेक्चरर( प्रवक्ता) की नौकरी मिल गई तो वह मिर्जापुर के केबी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में भौतिक विज्ञान पढ़ाने लगा। मगर मुस्तकबिल में भौतिक विज्ञान का नहीं राजनीति का गुरु बनना लिखा था। बात हो रही है राजनाथ सिंह की। आज 10 जुलाई को जन्मदिन के मौके पर फिजिक्स के मास्टर से राजनीति के ‘केमिस्ट्री गुरु’ बने राजनाथ सिंह के सियासी सफर के बारे में आपको जानकारी दे रहे हैं।

राजनाथ के बड़े मास्टस्ट्रोकः बात वर्ष 2000 की है, जब राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे।अचानक पता चला कि पूर्वांचल के बड़े व्यापारी के 15 वर्षीय बेटे राहुल मेधेशिया का फिरौती के लिए अपहरण हुआ है। अपहरण का आरोप उनकी कैबिनेट में शामिल मंत्री अमरमणि त्रिपाठी पर लगा। अपहर्ता लड़के को लखनऊ से नेपाल ले जाने की तैयारी में थे।  जब मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह को अपने ही मंत्री के अपहरण में शामिल होने की खबर लगी तो उन्होंने किसी भी हाल में लड़के की बरामदगी का पुलिस को निर्देश दिया। पुलिस ने मंत्री अमरमणि के ललखनऊ में कैंट स्थित घर पर छापा मारकर लड़के को रिहा कराया। इसके बाद राजनाथ सिंह ने अमरमणि त्रिपाठी को न केवल पद से हटाया बल्कि गिरफ्तार भी करवा दिया।बतौर मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह की अपने मंत्री के खिलाफ यह कार्रवाई काफी चर्चा में रही थी।

नकल अध्यादेश से मचाई खलबलीः1991 में जब कल्याण सिंह सरकार में राजनाथ सिंह शिक्षा मंत्री बने तो नकल विरोधी अध्यादेश लागू कर उन्होंने हड़कंप मचा दिया था। नकल में पकड़े गए परीक्षार्थियों को परीक्षा सेंटर से ही गिरफ्तार करने और कोर्ट से ही जमानत का प्रावधान था। उस दौरान खौफ से तमाम परीक्षार्थियों ने जहां परीक्षा छोड़ दी थी, वहीं पासिंग परसेंटेज बुरी तरह गिरा था। भारी संख्या में परीक्षार्थी फेल हुए थे।शिक्षा मंत्री रहते हुए राजनाथ सिंह ने वैदिक गणित को सिलेबस में शामिल कराने के साथ इतिहास की किताबों में जरूरी संशोधन भी कराए थे।

नरेश अग्रवाल को कर दिया बर्खास्तः राजनाथ सिंह सरकार में बीजेपी की गठबंधन सहयोगी पार्टी लोकतांत्रिक कांग्रेस नेता नरेश अग्रवाल मंत्री थे। वह कई बार दबाव की राजनीति करते थे। सरकार गिराने की धमकी देते थे। तंग आकर फिर राजनाथ सिंह ने साहसिक फैसला लिया। बताया जाता है कि पहले नरेश अग्रवाल को मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया और  खुद फोन पर उन्हें फैसले की जानकारी भी दी।तब नरेश अग्रवाल हरिद्वार में थे।

बीजेपी सरकार के लिए बने थे संकटमोचकःजब 1996 के यूपी विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो बसपा और बीजेपी के बीच गठबंधन से सरकार बनी थी। छह-छह महीने के मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों दलों के बीच समझौता हुआ। मायावती छह महीने तक सीएम रहीं, फिर कल्याण सिंह की बारी आई तो उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। इस पर सरकार गिरने लगी तो राजनाथ सिंह ने बड़ा दांव खेला। उस वक्त बसपा और कांग्रेस में फूट डलवा दी। बसपा और कांग्रेस से 20-20 विधायकों को तोड़कर उनसे अलग पार्टी बनवा दी। फिर बीजेपी को समर्थन दिलवाने में सफल रहे। जिससे बीजेपी की सरकार बच गई थी।

यूं बन गए सीएमः बसपा के समर्थन वापसी से भले ही कल्याण सिंह की सरकार गिरने से बच गई मगर वह कुर्सी संभाल नहीं पाए। अटल बिहारी बाजपेयी से मतभेद के कारण उनके खिलाफ ही कल्याण ने मोर्चा खोल दिया था। जिस पर अटल बिहारी वाजपेयी ने कल्याण सिंह को हटाकर रामप्रकाश गुप्त को मुख्यमंत्री बनाया था। कामकाज में लचर होने पर 11 महीने बाद ही गुप्त को  हटाकर 28 अक्टूबर 2000 को राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कमान सौंपी। राजनाथ सिंह कम ही समय सीएम रह पाए, वजह कि वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी की बुरी तरह हार हुई। जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि राजनाथ सिंह दूसरी बार विधायक निर्वाचित होने में सफल रहे। इस बार उनकी सीट बाराबंकी की हैदरपुर थी। 2002 में वह बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त हुए।24 मई 2003 को वाजपेयी सरकार में फिर केंद्रीय मंत्री बने। इस बार कृषि मंत्री का पद मिला।

यूं शुरू हुआ था सियासी सफरः10 जुलाई 1951 को जन्मे राजनाथ सिह का गांव भभोरा(अब चंदौली) तब बनारस जिले में था।कॉलेज के दिनों में ही छात्र राजनीति शुरू कर दी। 18 साल की उम्र में एबीवीपी के गोरखपुर प्रांत के सचिव बने।तीन साल इस पद पर रहे। 1972 में मिर्जापुर शहर में संघ ने उन्हें कार्यवाह(सचिव) की जिम्मेदारी सौंपी। पहला दायित्व निभाने में सफल रहे तो संघ ने भरोसा जताते हुए 1974 में भारतीय जनसंघ का मिर्जापुर का सचिव बना दिया। इस साल से राजनाथ सिंह मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े।1975 में वह मिर्जापुर के जिलाध्यक्ष बने उन्हें जेपी मूवमेंट के संयोजक की जिम्मेदारी मिली। इमरजेंसी के दौरान जनसंघी रामप्रकाश गुप्ता के साथ जेल में जाना पड़ा था। 1977 के विधानसभा चुनाव में राजनाथ सिंह पहली बार विधायक बने। 1984 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बे। वहीं 1986 में पार्टी ने कद बढ़ाते हुए उन्हें भाजयुमो का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया।

फिर दो साल बाद 1988 में युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने में सफल रहे। 1988 में राजनाथ एमएलसी बनने में सफल रहे। अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद जब कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो बीजेपी की सरकार गिर गई। 1993 में यूपी में हुए चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन ने बीजेपी को 213 के बहुमत आंकड़े से बहुत पीछे 177 पर रोक दिया फिर हुए चनाव में सपा-बसपा गठबंधन के आगे बीजेपी का सत्ता में आने का ख्वाब पूरा नहीं हुआ।1994 में बीजेपी ने अपने कोटे से उन्हें राज्यसभा भेजा।25 मार्च, 1997 को राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश में पार्टी के अध्यक्ष बने। 22 नवंबर 1999 को वाजपेयी सरकार में केंद्रीय परिवहन मंत्री बने।इस दौरान नेशनल हाइवे डेवलपमेंट प्रोग्राम को परवान चढ़ाने में योगदान दिया।

तीन बार अध्यक्ष बनने का रिकॉर्डः जब जिन्ना विवाद में आडवाणी फंसे तो उन्हें अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। संघ के निर्देश पर एक जनवरी 2006 को राजनाथ सिंह को बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया। वह दूसरी बार भी अध्यक्ष पद के लिए चुने गए और 2009 तक इस पद पर रहे। दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रहकर राजनाथ सिंह अटल बिहारी,आडवाणी और वेंकैया नायडू की सूची में जगह बना चुके थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद राजनाथ सिंह को अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। फिर नितिन गडकरी राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए।2013 में कथित वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगने पर नितिन गडकरी दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बन सके। फिर तीसरी बार राजनाथ बीजेपी के अध्यक्ष बनने में सफल रहे। 2014 में नरेंद्र मोदी कैबिनेट में गृहमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ दिया। जिसके बाद से अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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