यूएनएचआरसी पीओके, गिलगित-बाल्टिस्तान में मानवाधिकार हनन पर संज्ञान लेगा?
Wednesday, 11 September 2019 09:52

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नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त मिशेल बेकलेट जब सोमवार को जम्मू एवं कश्मीर के मुद्दे पर बोलीं तो उन्होंने पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर तथा गिलगित-बाल्टिस्तान में दशकों से किए जा रहे अत्याचारों को नजरंदाज किया। पाकिस्तान द्वारा 1947 में जबरन शामिल करने से पहले अविभाजित जम्मू एवं कश्मीर का हिस्सा रहे इन क्षेत्रों के लोगों ने बार-बार पाकिस्तान का कब्जा और वहां हो रहे मानवाधिकारों के हनन को खत्म करने की मांग की है।

पाकिस्तान अपनी बर्बर सेना द्वारा उनकी आवाज दबाता रहा है। सेना पाकिस्तान के अधिकार के खिलाफ बोलने वाले लोगों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार कर आतंकवाद-रोधी अधिनियम (एटीए) जैसे कठोर कानूनों के तहत जेल में डाल देती है। इसका ऐसा ही एक उदाहरण स्थानीय राजनेता बाबा जान है।

इन क्षेत्रों पर पाकिस्तान का कड़ा नियंत्रण है, और यहां तक कि मीडिया तक को यहां की घटनाओं के बारे में सच लिखने की आजादी नहीं है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर वायरल हुए स्थानीय लोगों द्वारा विरोध करने के वीडियो बताते हैं कि यहां स्थिति कितनी खराब है।

बेकमेट सोमवार को संयुक्त राष्ट्र परिषद के 42वें सत्र को संबोधित कर रही थीं। पाकिस्तान सत्र में जम्मू एवं कश्मीर को विशेष दर्जा खत्म किए जाने के मुद्दे को उठाने की तैयारी कर रहा है और भारत पूरी मजबूती से उसका सामना करने के लिए तैयार है।

जहां पाकिस्तान भारत सरकार द्वारा जम्मू एवं कश्मीर का विशेष खत्म किए जाने पर हो-हल्ला मचाता रहा है, वहीं वह इस तथ्य को आसानी से नजरंदाज कर देता है कि सिर्फ एक साल पहले उसने गिलगित-बाल्टिस्तान के निवासियों के सभी अधिकार अवैध रूप से रद्द कर दिए थे।

गिलगित-बाल्टिस्तान आदेश 2018 ने गिलगित बाल्टिस्तान परिषद के सभी अधिकार समाप्त कर दिए और क्षेत्र के संबंध में पूरा अधिकार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को सौंपा।

इस आदेश के तहत, स्थानीय निकायों के सभी अधिकार छीन लिए गए और यहां तक कि कर लगाने का अधिकार भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को सौंप दिया गया, जिसे कोर्ट तक में चुनौती नहीं दी जा सकती।

गिलगित-बाल्टिस्तान के न्यायिक तंत्र में भी दखल कर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने न्यायपालिका के अधिकारियों को चुनने का अपना रास्ता साफ कर लिया।

स्थानीय लोगों ने इस कदम को क्षेत्र के लोगों का भविष्य में दमन करने वाला बताया। पाकिस्तान ने इस क्षेत्र पर बलपूर्वक 1947 में कब्जा कर लिया था और तबसे इस पर अवैध कब्ज किए हुए है।

पिछले साल भारत ने पाकिस्तान सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध किया था। विदेश मंत्रालय ने 27 मई 2018 को दिल्ली में पाकिस्तान के उप उच्चायुक्त को समन भेजा था और उन्हें स्पष्ट रूप से बता दिया था कि 1947 में बंटवारे के आधार पर गिलगित-बाल्टिस्तान समेत जम्मू एवं कश्मीर का पूरा क्षेत्र भारत का आंतरिक हिस्सा है।

पाकिस्तानी राजनयिक को बताया गया था, "पाकिस्तान द्वारा क्षेत्र के किसी हिस्से की स्थिति को जबरन बदलने के लिए की गई कोई भी कार्रवाई वैध नहीं मानी जाएगी और ना स्वीकार की जाएगी। कब्जे वाले क्षेत्रों की सीमाओं को बदलने की मांग करने की अपेक्षा पाकिस्तान को अवैध रूप से कब्जा किए गए क्षेत्र को तत्काल खाली कर देना चाहिए।"

भारत ने इस पर भी जोर दिया कि ऐसी कार्रवाइयां ना तो जम्मू एवं कश्मीर के हिस्सों पर पाकिस्तान के कब्जे को छिपा पाएंगी और ना ही पिछले सात दशकों से हो रहे मानवाधिकार हनन व शोषण को दबा पाएंगी।"

--आईएएनएस

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