जब गुस्से में नसीरुद्दीन शाह ने डायरेक्टर को मार दिया मुक्का

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नसीरूद्दीन शाह आज अपना 69वां जन्मदिन मना रहे हैं। 1975 में आर्ट हाउस फिल्म ‘निशांत’ से अपने करियर की शुरूआत करने वाले नसीर ने फिल्म ‘भूमिका’ और ‘मंथन’ के साथ ही अपने आपको आर्ट हाउस सिनेमा के एक शानदार अभिनेता के तौर पर स्थापित कर लिया था। नसीर जितना अपने किरदारों को लेकर पैशनेट थे उतना ही वे रियल लाइफ में भी इंटेन्स इंसान हैं, यही कारण है कि एक बार अपने एक डायरेक्टर के साथ क्रिएटिव मुद्दों को लेकर हुई उनकी बहस हाथापाई तक पहुंच गई थी।

दरअसल 1990 में नसीर फिल्म ‘मासूम गवाह’ की शूटिंग कर रहे थे। इस फिल्म के डायरेक्टर एम.एम बेग थे। नसीर और बेग के बीच में किसी सीन को लेकर बहस होने लगी और ये बहस धीरे-धीरे हाथापाई में तब्दील हो गई। नसीर और बेग के बीच ये झगड़ा इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि आज भी दोनों ने इस मामले को सुलझाने की कोशिश नहीं की है और इस फिल्म के बाद दोनों ने कभी एक दूसरे के साथ काम नहीं किया। अपनी एक्टिंग के शुरुआती दौर में उन्होंने नॉन कमर्शियल फिल्में की जिनमें उनका किरदार यथार्थ के करीब होता था। 1980 में आई फिल्म आक्रोश और 1983 में आई फिल्म जाने भी दो यारो के साथ ही नसीर पैरेलल सिनेमा के एक महारथी एक्टर के तौर पर पहचाने जाने लगे थे। लेकिन नसीर ने न केवल आर्ट हाउस सिनेमा बल्कि कमर्शियल सिनेमा में भी अपनी एक्टिंग के जलवे दिखाए। मासूम’, ‘कर्मा’, ‘इजाज़त’, ‘जलवा’, ‘हीरो हीरालाल’, ‘गुलामी’, ‘त्रिदेव’, ‘विश्वात्मा’, जैसी मेनस्ट्रीम और कमर्शियल फिल्में कर उन्होंने अपनी एक्टिंग की रेंज को साबित किया था। हालांकि एक शानदार अभिनेता होने के बावजूद नसीर के लिए बॉलीवुड की राह कड़े संघर्षों से भरी रही।

हालांकि नसीरूद्दीन का काम इतना शानदार होता था कि उस दौर में ज़्यादातर अच्छे किरदार उनके खाते में ही चले जाते थे। यही वजह है कि एक बार एफटीआईआई की कैंटीन में उनके एक दोस्त ने नसीर को चाकू मार दिया था। राजेंद्र जसपाल नाम का ये शख़्स नसीर का दोस्त ही था लेकिन वो नसीर से काफी जलता था क्योंकि नसीर को लगभग सारे बेहतरीन किरदार मिल जाते थे लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिलता था। उस दौरान ओम पुरी नसीर को अस्पताल लेकर गए थे। इसी तरह की इनसिक्योरिटी नाना पाटेकर को भी थी। उन्होंने एक बार नसीर को लेकर कहा था – ‘सारे अच्छे रोल, सारा सम्मान, सारे अवॉर्ड्स उन्हें ही मिल जाते थे। मुझे कुछ नहीं मिलता था.’ नाना ने मज़ाकिया लहज़े में कहा था, ‘कई बार मुझे लगता कि नसीर को कोई चोट-वोट लग जाए, कुछ दिनों के लिए वो अनफ़िट हो जाएं ताकि मुझे वो रोल मिलने शुरू हो जाएं, लेकिन भगवान ने मेरी एक ना सुनी और नसीर कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते चले गए।

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