नई दिल्ली: गर्मी का मौसम अपने साथ कई बीमारियां लेकर आता है। गर्मी और उमस के बीच यह इम्यून सिस्टम को भी प्रभावित करता है। पाचन और त्वचा संबंधी समस्याओं के साथ ही मौसमी फ्लू और संक्रमण का भी इस दौरान खतरा बना रहता है।

ऐसे में गर्मी को लेकर पहले से ही तैयारी कर लेनी चाहिए। गर्मी में होने वाली बीमारियों से परहेज करने या लड़ने के लिए स्टेहैप्पी फार्मेसी के प्रबंध निदेशक डॉ. सुजीत पॉल कुछ जरूरी टिप्स साझा कर रहे हैं -

रहें हाइड्रेटेड : यदि आपके शरीर में पर्याप्त पानी है तो आप 90 फीसदी बीमारियों से लड़ सकते हैं। पानी को शरीर के फाइबर द्वारा हमारे कोलोन में खींच लिया जाता है और यह नरम मल बनाने में शरीर की मदद करता है। साथ ही बिना किसी तकलीफ के इसका रास्ता भी आसान हो जाता है।

फाइबर इनटेक : अनाज, सब्जियां, फलियां और फल जैसे फाइबर के बेहतरीन स्रोत वाले खाद्य पदार्थ हमारे पाचन तंत्र को दुरुस्त करते हैं और व्यक्ति कब्ज होने की आशंका से दूर होता है, जो अंतत: फिशर का कारण बनता है।

कम कैफीन : गर्मी में कैफीन का सेवन भी आपके पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है, जो आगे चलकर अल्सर, एसिडिटी और जलन का कारण बनता है।

वर्कआउट : पसीने का निकलना बहुत अच्छा है क्योंकि यह आपके शरीर से गंदगी को निकालने में मदद करता है। साथ ही आपके शरीर को फिट और स्वस्थ रखने में भी सहायक है। हम जितना अधिक शारीरिक तौर पर सक्रिय रहेंगे, हमारे लिए जीवन खुशहाल होगा।

धूप से दूरी : संभव हो तो धूप में तीन घंटे से ज्यादा रहने से परहेज करें और सूती जैसे हल्के कपड़े पहनें।

नियमित हेल्थ चेकअप : कई बार हम कुछ लक्षणों की गंभीरता को नजरअंदाज करते हुए डॉक्टर के पास जाने से परहेज करते हैं। लेकिन बेहतर होगा कि स्वास्थ्य के मालमों में हम विशेषज्ञ से संपर्क करें। किसी भी तरह की गंभीर समस्या से बचने के लिए नियमित तौर पर हेल्थ चेकअप के लिए जाना चाहिए।

गरमी के मौसम में कई अन्य तरह की समस्या भी हो जाती है, जैसे- जॉन्डिस, टाइफॉयड और फूड प्वायजनिंग आदि। बेहतर होगा कि आप अपने खान- पान की आदतों के साथ धूप में समय बिताने को लेकर सतर्क रहें। बाहर के खाने से परहेज, मील्स नहीं छोड़ना और बाहरी ड्रिंक एवं अल्कोहल की बजाय स्वास्थ्यकर विकल्पों जैसे छोटे बदलाव बड़ा अंतर ला सकते हैं। ये छोटे लेकिन अनहेल्दी आदतें आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

-- आईएएनएस

 

 

क्या आप ज्यादातर रात्रि पाली में काम करते हैं? पर्याप्त नींद की कमी और रात्रि में जागने से मानव डीएनए की संरचना में क्षति हो सकती है और इससे कई तरह की बीमारियां घर कर सकती हैं। रात्रि पाली में काम करने से कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग, श्वास संबंधी एवं तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियां हो सकती हैं।

एनस्थेशिया एकेडमिक जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, रात्रि में काम करने वालों में डीएनए मरम्मत करने वाला जीन अपनी गति से काम नहीं कर पाता और नींद की ज्यादा कमी होने पर यह स्थिति और बिगड़ती जाती है। 

शोध में पाया गया है कि जो व्यक्ति रात भर काम करते हैं, उनमें डीएनए क्षय का खतरा रात में काम नहीं करने वालों के मुकाबले 30 फीसदी अधिक होता है। 

वैसे लोग जो रात में काम करते हैं और पर्याप्त नींद नहीं ले पाते हैं, उनमें डीएनए क्षय का खतरा और 25 फीसदी बढ़ जाता है। 

यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग के रिसर्च एसोसिएट एस. डब्ल्यू. चोई ने कहा, "डीएनए खतरा का मतलब डीएनए की मूलभूत संरचना में बदलाव है। यानी डीएनए जब दोबारा बनता है, उसमें मरम्मत नहीं हो पाता है और यह क्षतिग्रस्त डीएनए होता है।"

चोई ने कहा कि जब डीएनए में मरम्मत नहीं हो पाता तो यह खतरनाक स्थिति है और इससे कोशिका की क्षति हो जाती है। मरम्मत नहीं होने की स्थिति में डीएनए की एंड-ज्वाइनिंग नहीं पाती, जिससे ट्यूमर बनने का खतरा रहता है। 

शोध में 28 से 33 साल के स्वस्थ डॉक्टरों का रक्त परीक्षण किया गया, जिन्होंने तीन दिन तक पर्याप्त नींद ली थी। 

इसके बाद उन डॉक्टरों का रक्त परीक्षण किया गया, जिन्होंने रात्रि में काम किया था, जिन्हें नींद की कमी थी। 

चोई ने कहा, "शोध में यह पाया गया है कि बाधित नींद डीएनए क्षय से जुड़ा हुआ है।" 

--आईएएनएस

बच्चे को जन्म देने वाली महिलाओं को दिल की बीमारी का खतरा उन महिलाओं से ज्यादा रहता है, जिनकी कोई संतान नहीं है। यह बात एक हालिया शोध में प्रकाश में आई है। पूर्व के अध्ययनों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में अक्सर नाड़ी, रक्त की मात्रा, हृदय गति आदि में बदलाव दिखता है, हालांकि गर्भधारण करने से हृदय रोग होने की बात विवाद का विषय बनी हुई है। 

चीन के हुआझोंग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलोजी की एक टीम ने हालिया शोध में 10 अध्ययनों की समीक्षा की, जिसमें दुनियाभर में 30 लाख महिलाओं को शामिल किया गया। शोध में 1.5 लाख महिलाओं में गर्भधारण के छह से 52 साल के दौरान दिल की बीमारी पाई गई। 

यूरोपियन सोसायटी ऑफ कार्डियोलोजी जर्नल में प्रकाशित हुए शोध के नतीजों में पाया गया कि बच्चे को जन्म देने से हृदय रोग व आघात का खतरा 14 फीसदी बढ़ जाता है।

विश्वविद्यालय के प्रमुख शोधकर्ता वांग डोंगमिंग के अनुसार, गर्भधारण करने से शरीर में जलन पैदा होती है और पेट के चारों ओर और खून व धमनियों में चर्बी जमा होने लगती है। 

उन्होंने कहा कि इस परिवर्तन से कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम पर स्थायी प्रभाव पड़ता है, जिससे हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। 

--आईएएनएस

खाद्य जनित बीमारियां या फूड पॉइजनिंग आम तौर पर उन खाद्य पदार्थो को खाने से होती है, जो दूषित बैक्टीरिया या उनके विषाक्त पदार्थो से होती है। चिकित्सकों का कहना है कि वायरस और परजीवी भी फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकते हैं। हार्ट केयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, "लोग लंबे समय से जानते हैं कि कच्चे मांस, मुर्गी और अंडे भी रोगाणुओं का कारण बन सकते हैं। हाल के वर्षो में ताजे फल और सब्जियों के कारण खाद्य जनित बीमारियों का सबसे ज्यादा प्रकोप रहा है।" 

उन्होंने कहा, "फलों और सब्जियों की पूरी तरह से धुलाई और उचित तरीके से खाना पकाने से, खाद्य विषाक्तता का कारण बनने वाले अधिकांश बैक्टीरिया समाप्त हो सकते हैं, लेकिन कुछ स्ट्रेन हैं, जो प्रतिरोधी के रूप में उभर रहे हैं।"

उन्होंने कहा, "इस प्रकार यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि स्रोत पर ही नुकसान को कम किया जाए। खाद्य जनित बीमारियां या फूड पॉइजनिंग आम तौर पर उन खाद्य पदार्थो को खाने से होती है, जो दूषित बैक्टीरिया या उनके विषाक्त पदार्थो से होते हैं। वायरस और परजीवी भी फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकते हैं।"

फूड पॉइजनिंग के कुछ लक्षणों में पेट में दर्द, मतली, सिरदर्द, थकान, उल्टी, दस्त और निर्जलीकरण शामिल हैं। ये खराब भोजन लेने के बाद कई घंटों से लेकर कुछ दिन तक दिखाई दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, साल्मोनेला बैक्टीरिया 4-7 दिनों के बाद, 12 घंटे से 3 दिन तक बीमारी का कारण बन सकता है।

डॉ. अग्रवाल ने बताया, "फूड पॉइजनिंग का इलाज करने का सबसे आम तरीका है कि आप बहुत सारे तरल पदार्थ पीएं। बीमारी आमतौर पर कुछ दिनों में कम हो जाती है। हालांकि, कुछ बुनियादी कदमों के साथ स्वच्छता बनाए रखना भी जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण है हाथ धोना। खुले में शौच से बचना चाहिए और उपभोग से पहले फलों और सब्जियों को साफ पानी से धोया जाना चाहिए।"

उन्होंने कहा हालांकि फूड प्वॉइजनिंग के लक्षण लगभग 48 घंटों में गायब हो जाते हैं, लेकिन फिर भी निम्न युक्तियां स्थिति से मुकाबला करने में मदद कर सकती हैं।

डॉ. अग्रवाल ने फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए कुछ सुझाव देते हुए कहा, "अपने पेट को व्यवस्थित होने दें। कुछ घंटों के लिए खाना-पीना बंद कर दें। बर्फ के चिप्स चूसने या पानी के छोटे घूंट लेने की कोशिश करें। जब आप सामान्य रूप से मूत्र त्याग कर रहे होते हैं और आपका मूत्र स्पष्ट और डार्क नहीं होता है, तो इसका मतलब है कि शरीर पर्याप्त हाइड्रेटेड है।"

उन्होंने कहा, "धीरे-धीरे खाना शुरू करें। कम वसा वाले, आसानी से पचने वाले खाद्य पदार्थ, जैसे कि टोस्ट, केला और चावल खाना शुरू करें। अगर आपको फिर से मतली होने लगे तो खाना बंद कर दें। जब तक आप बेहतर महसूस नहीं करते, तब तक कुछ पेय और खाद्य पदार्थो से बचें। इनमें डेयरी उत्पाद, कैफीन, शराब, निकोटीन, और वसायुक्त या अत्यधिक तले हुए खाद्य पदार्थ शामिल हैं।" 

-- आईएएनएस

भागदौड़ वाली दिनचर्या, अव्यवस्थित जीवनशैली, काम का बोझ और मानसिक तनाव के बीच बुरी लतें मौजूदा दौर में लोगों की परेशानी और बढ़ा रही हैं, क्योंकि उनकी शारीरिक ऊर्जा दिन-ब-दिन क्षीण होती चली जाती है। विशेषज्ञ इसे गंभीर चिता का विषय बताते हैं। क्लिनिकल न्यूट्रीशियन, डाइटिशियन और हील योर बॉडी के संस्थापक रजत त्रेहन ने कहा कि लोगों यह सोचने की जरूरत है कि शारीरिक ऊर्जा को कम करने वाली कौन सी बुरी आदतें हैं जिन्हें त्यागकर वह स्वस्थ जीवनशैली अपना सकते हैं। 

ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कुल 130 करोड़ आबादी में से 28.6 फीसदी लोग तंबाकू का सेवन करते हैं। रिपोर्ट में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि करीब 18.4 फीसदी युवा न सिर्फ तंबाकू, बल्कि सिगरेट, बीड़ी, खैनी, बीटल, अफीम, गांजा जैसे अन्य खतरनाक मादक पदार्थो का सेवन करते हैं। 

बीते साल आई डब्लयू.एच.ओ की ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट में भी कुछ ऐसे ही चिंताजनक आंकड़े सामने आए थे। 2017 में आई इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बीते 11 सालों में प्रति व्यक्ति शराब की खपत दोगुनी हुई है। जहां 11 साल पहले एक व्यक्ति 3 लीटर शराब पीता था वहीं बीते 11 वर्षो में बढ़कर इसकी खपत बढ़कर 6 लीटर हो गई है। 

रिपोर्ट के अनुसार, इस दशक में भारतीय युवाओं में तंबाकू और शराब के अलावा एक और नशीले पदार्थ की लत तेजी से बढ़ी है। वह नशीला पदार्थ है ड्रग्स। ड्रग्स और अन्य मादक पदार्थो के सेवन से शारीरिक कार्यक्षमता बनाए रखने में ऊर्जा का अत्यधिक उपयोग होता है, जिसके चलते ये नशीले पदार्थ यकृत और फेफड़ों में विषाक्त पदार्थ के रूप मं जमा होने लगते हैं ।

खान-पान की आदतें भी बीते कुछ वर्षो में काफी तेजी से बदली है। सपरफूड से लेकर जंक फूड न केवल शहरों बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी अब पांव पसारने लगे हैं। साल 2018 में आई क्लिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 35 फीसदी भारतीय सप्ताह से भी कम समय में एक बार फास्ट फूड खाते हैं। 

इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 14 फीसदी स्कूली बच्चे मोटापे का शिकार हैं। जंक फूड में जरूरी पोषण तत्वों की कमी से मोटापा बढ़ता है, कम उम्र में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का खतरा और लीवर और खाना पचाने वाले अन्य पाचन अंगों को जंक फूड को पचाने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा और हार्मोनल स्त्राव की आवश्यकता होती है, क्योंकि इन खाद्य पदार्थो में काबोर्हाइड्रेट और वसा की उच्च मात्रा होती है।

बदलती जीवन शैली और शहरी लाइफस्टाइल कम नींद का एक प्रमुख कारण है। काम का बोझ, शिक्षा का दबाव, रिश्तों में आती खटास, तनाव और अन्य समस्याओं के कारण लोगों को नींद नहीं आती है। युवा ज्यादातर समय मूवी देखने और रात में पार्टी करने में बिताते हैं। 

विशेषज्ञ बताते हैं कि नींद की कमी से तनाव के हार्मोन रिलीज होते हैं। यह टेस्टोस्टेरोन कम करता है। कम नींद से हृदय रोग और मोटोपे बढ़ने का खतरा बना रहता है। कम नींद की वजह से शरीर को और भी ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है ऐसे में वसा का संचय होता है, जिससे मधुमेह यानी डायबीटिज का खतरा कई गुना तक बढ़ जाता है।

योग, ध्यान और व्यायाम ये तीनो चीजें शरीर और शरीर से जुड़ी स्वास्थ्य समास्याओं से निजात पाने की संजीवनी हैं। ये सभी हमारे शरीर को ब्लड सकुर्लेशन को नॉर्मल (रक्त संचरण) और हार्मोन्स को बैलेंस करते हैं इसके साथ ही शारीरिक ऊर्जा और उसकी कार्य क्षमता को बनाए रखते हैं। शारीरिक व्यायाम करने के दौरान हमारे शरीर से वसा और कैलोरी बर्न होती है, जिससे शरीर को अधिक ऊर्जा मिलती है।

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 क्या आप अपने कंप्यूटर पर कार्य की वजह से सिर या गरदन व पीठ के दर्द से पीड़ित हैं? आपके बैठने की स्थिति दर्द से बचाने में सहायक हो सकती है। कंप्यूटर को बहुत करीब से सिर झुकाकर देखने से गर्दन पर दबाव पड़ता है, इससे थकान, सिर में दर्द, एकाग्रता में कमी, मांसपेशीय तनाव में वृद्धि व ज्यादा समय तक कार्य करने से मेरुदंड में घाव हो सकता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे सिर मोड़ने की क्षमता में कमी आ सकती है।

सैन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर इरिक पेपर ने कहा, "जब आपके बैठने की स्थिति सीधी होती है, तो आपकी पीछे की मांसपेशियां आपके सिर व गर्दन के भार को सहारा देती हैं।"

पेपर ने कहा, "जब आप सिर को 45 डिग्री के कोण पर आगे करते हैं तो आपकी गर्दन एक आधार की तरह कार्य करती है, यह एक लंबे लीवर के भारी वस्तु उठाने जैसा है। अब आपके सिर व गर्दन का वजन करीब 45 पाउंड के बराबर हो जाता है। इसलिए कंधे व पीठ में दर्द व गर्दन में अकड़न हो तो चकित होने की बात नहीं है।"

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चिकित्सकों का कहना है कि स्मार्टफोन व वीडियो गेम आदि पर दिन में सात घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले नौ से 10 साल की उम्र के बच्चों के कॉर्टेक्स (मस्तिष्क की बाहरी परत) समय से पहले पतले हो सकते हैं। हार्ट केयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, "स्क्रीन पर अधिक समय बिताने से सिर्फ आंखें ही प्रभावित नहीं होती हैं, बल्कि पहले छह वर्षो में एक बच्चे का मस्तिष्क तेजी से विकसित होता है और उसे निष्क्रिय बैठे रहने के बजाय रचनात्मक स्टिमुलेशन की जरूरत होती है। स्क्रीन कंटेंट केवल निष्क्रियता को बढ़ाती है।" 

उन्होंने कहा, "एक समय में 10 मिनट से ज्यादा एक्सपोजर मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकता है। आज स्क्रीन टाइम में वृद्धि हुई है, विशेष रूप से बच्चों में। हालांकि काम निपटाने के लिए यह उपयोगी लग सकता है या बच्चे को वीडियो चलाकर खाना खिलाना आसान हो सकता है, लेकिन इसके कई दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव हो सकते हैं।"

उन्होंने कहा कि भोजन के दौरान फोन पर कुछ देखते हुए खाने वाले बच्चे ज्यादा खुराक ले सकते हैं। वे भोजन और मनोरंजन के बीच अस्वास्थ्यकर कनेक्शन बनाना शुरू कर सकते हैं। मायोपिया या शॉर्ट-साइट के लिहाज से भी स्क्रीन पर बहुत अधिक समय लगाना जोखिमपूर्ण हो सकता है। यह आंखों पर अत्यधिक तनाव पैदा कर सकता है और आंखों के सूखेपन का कारण बन सकता है।

डॉ. अग्रवाल ने बताया, "गैजेट्स के माध्यम से अलग-अलग स्ट्रीम द्वारा प्राप्त जानकारी मस्तिष्क के ग्रे-मैटर के घनत्व को कम कर सकती हैं, जो संज्ञान और भावनात्मक नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है। इस डिजिटल युग में, संयम ही अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी होनी चाहिए, यानी प्रौद्योगिकी का कम से कम उपयोग होना चाहिए।" 

उन्होंने कुछ सुझाव देते हुए कहा, "बच्चों को व्यस्त रखने के लिए, फोन देने के बजाय, उनके साथ बातचीत करें और उनके साथ कुछ समय बिताएं। इससे किसी डिवाइस की जरूरत नहीं रहेगी। कंप्यूटर या टीवी को घर के खुले स्थान पर रखें। इस तरह उनके उपयोग को ट्रैक करना और स्क्रीन टाइम को सीमित करना आसान होगा। पूरे घर के लिए दिन में कुछ घंटे जीरो स्क्रीन टाइम होने चाहिए।" 

उन्होंने कहा, "अगर, माता-पिता के रूप में आप मोबाइल और कंप्यूटर के लिए बहुत समय लगाते हैं, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से आपके जैसा करेंगे। उनके लिए एक सकारात्मक भूमिका का मॉडल सामने रखें। भोजन के समय स्क्रीन से दूर रहना चाहिए और परिवार के साथ बैठकर खाने के लिए एक समय नियत होना चाहिए। इसका नियम से पालन करें। सुनिश्चित करें कि बच्चे बाहरी गतिविधियों में पर्याप्त समय बितायें। इससे उन्हें स्मार्टफोन का उपयोग कम करने की प्रेरणा मिलेगी।" 

--आईएएनएस

 मछली के तेल में पाया जानेवाला ओमेगा-3एस सर्जरी के दौरान रक्तस्त्राव के जोखिम को कम करता है। वर्तमान में मान्यता यह है कि सर्जरी से पहले मछली का तेल खाना बंद कर देना चाहिए। शोधकर्ताओं ने यह जानकारी दी है। मछली का तेल हाइपरट्रिग्लीसेरीडेमिया या कार्डियोवैस्कुलर (हृदय संबंधी) बीमारी की रोकथाम के लिए सबसे आम प्राकृतिक पूरक है। 

हालांकि सर्जरी के दौरान रक्तस्त्राव के जोखिम को कम करने के लिए मरीजों को सर्जरी से पहले मछली का तेल लेने से मना करने की सिफारिश की जाती है या जो मरीज मछली का तेल रहे हैं, उनकी सर्जरी में देरी करने की सिफारिश की जाती है। 

यह शोध सर्कुलेशन नाम के जर्नल में प्रकाशित किया गया है, जिसमें बताया गया है कि रक्त में ओमेगा-3 की उच्च मात्रा - ईपीए और डीएचए मिलकर रक्तस्त्राव के जोखिम को कम करता है। 

यह शोध कुल 1,516 मरीजों पर किया गया, जिनकी कार्डिएक सर्जरी होनी थी। आधे मरीजों को ओमेगा-3एस का डोज दिया गया, जबकि आधे मरीजों को प्लेसबो (शोध के लिए झूठी-मूठी दवाई देना) दिए गए। 

शोध के दौरान पाया गया कि जिन मरीजों को ओमेगा-3एस दिया गया था, उनमें सर्जरी के दौरान चढ़ाने के लिए कम यूनिट रक्त की जरूरत पड़ी। 

ओमेगाक्वांट के संस्थापक बिल हैरिस ने कहा, "इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि कार्डिएक सर्जरी से पहले मछली के तेल का सेवन रोकने या सर्जरी में देरी की जो सिफारिश की जाती है, उस पर पुर्नविचार करने की जरूरत है।"

ओमेगा-3एस खासतौर से ईपीए और डीएचए हृदय, मस्तिष्क, आंखें और जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन ज्यादातर लोग इस मूल्यवान फैटी एसिड का पर्याप्त सेवन नहीं करते हैं, जो स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरों का जोखिम बढ़ाता है। 

--आईएएनएस

सर्दियों में होंठ व हाथ रूखे हो जाते हैं। ऐसे में इन्हें खास देखभाल की जरूरत होती है। नायका (एफएसएन) ब्रांड्स मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड की सीईओ रीना छाबड़ा ने होंठ और हाथों की देखभाल के संबंध में ये सुझाव दिए हैं : 

होंठ की देखभाल : 

- होंठों को रूखेपन व फटने से बचाने के लिए आर्गन प्योर कोल्ड प्रेस्ड ऑयल की कुछ बूंदों में एक बड़ा चम्मच ब्राउन शुगर मिलाकर लगाएं। 

- फटे होंठों के लिए शहद मॉइश्चराइजर का काम करता है। शहद को अपने होंठों पर लगा लें या फिर रात में सोने से पहले शहद और ग्लिसरीन के मिश्रण को लगा लें। 

- आप चाहे तो ताजे दूध की क्रीम भी होंठों पर लगा सकते हैं और इसे 10 मिनट तक लगा रहने दें। फिर इसे गुनगुने पानी में भीगी रूई के फाहे से हल्के हाथों से साफ कर लें। कोमल व गुलाबी रंगत के होंठों के लिए ऐसा रोजाना करें।

- रात में सोने जाने से पहले होंठों को गुनगुने पानी से धोकर मुलायम कपड़े से पोंछे ले और फिर तुरंत लिप बाम लगा लें। 

हाथों के लिए सुझाव 

- हाथ धुलने के बाद मॉइश्चराइजर बरकरार रखने के लिए हमेशा अच्छा हैंड क्रीम लगाएं। 

- रात में हाथों को अच्छे नरीशिंग क्रीम से मसाज करें और नाखूनों व नाखूनों के आसपास के हिस्से में भी मसाज करना नहीं भूलें। 

- नहाने से पहले त्वचा पर तेल से मसाज करें। इससे आपके हाथ मुलायम बनेंगे। 

- नहाने के तुरंत बाद लोशन या क्रीम लगाएं। इससे त्वचा में नमी बरकरार रहेगी। 

- सर्दियों में शावर जेल या ग्लिसरीन युक्त साबुन का इस्तेमाल करें। 

- एक बड़े चम्मच एवोकैडो ऑयल में एक बड़ा चम्मच शहद और एक बड़ा चम्मच दही मिला लें और इससे हाथों की मसाज करें। हाथों का रूखापन दूर करने के लिए 10 मिनट बाद धो लें। 

'सोलफ्री' की सह-संस्थापक स्वाति कपूर ने भी इस संबंध में ये सुझाव दिए हैं :

- होंठों की नमी बरकरार रखने के लिए पानी का सेवन खूब करें, इससे आपके होंठों की कोमलता बरकरार रखने में मदद मिलेगी। 

- सर्दियों में होंठों को फटने से बचाने के लिए ऑर्गेनिक घी, बादाम तेल और नारियल तेल युक्त लिप बाम का इस्तेमाल करें। 

- सर्दियों में लिपस्टिक आपके होंठों को सुरक्षा प्रदान करता है। पिंक या प्लम कलर के लिपस्टिक लगा सकती हैं, जो आपके होंठों की न सिर्फ खूबसरती बढ़ाएगा, बल्कि इसे कोमल भी रखेगा। ऑर्गेनिक घी, शहद, बादाम तेल, रोज ऑयल जैसे इंग्रेडिएंट्स सर्दियों में आपके होंठों को कोमल रखेंगे। 

- रोजाना हैंडक्रीम लगाने से हाथ रूखे नहीं होंगे। कोकम बटर, ऑर्गेनिक हनी, एलो, हल्दी, सेसम ऑयल, एप्रिकोट ऑयल जैसे इंग्रेडिएट्स अल्ट्रा-मॉइश्चराइजिंग होते हैं, जो त्वचा को मुलायम रखते हैं। 

- गर्मियों की तरह ही सर्दियों में भी त्वचा को हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाना जरूरी है। तेज धूप में त्वचा को टैनिंग से बचाने के लिए धूप में निकलने से पहले सन प्रोटेक्शन क्रीम का इस्तेमाल करें। 

--आईएएनएस 

 

सर्दियों का मौसम आते ही हमारी त्वचा के लिए मुश्किल घड़ी आ जाती है और इस दौरान सही देखभाल न होने पर त्वचा फटने लगती है। इस मौसम में त्वचा सूख जाती है और इसका सबसे अधिक प्रभाव कोहनी, घुटने और ऐड़ी पर दिखाई देता है, जिससे निजात पाने के लिए त्वचा रोग विशेषज्ञ ने कुछ सुझाव दिए हैं। वीएलसीसी के डर्मेटोलॉजी के हेड ऑफ डिपार्टमेंट व कॉस्मेटिक सर्जन डॉ. डीजेएस तुला ने कहा, "त्वचा का सर्दियों में बचाव करने के लिए यह जरूरी है कि पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन किया जाए। इससे आपके शरीर में नमी बनी रहती और सूखेपन से बचाव होता है। ठंड के मौसम में कॉफी और चाय से परहेज करें, क्योंकि ये त्वचा की सुंदरता के लिए सहायक नहीं हैं। ग्रीन टी एक बेहतर विकल्प है, क्योंकि इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट प्रभाव होते हैं जो त्वचा को निखारने में मदद करते हैं।" 

उन्होंने कहा, "गर्मी हो या सर्दी त्वचा की सफाई अनिवार्य है। अगर त्वचा साफ करने के बाद थोड़ी कठोर हो जाती है, तो शायद इसका मतलब यह हो सकता है कि त्वचा पर इस्तेमाल किया गया क्लिंजर सही नहीं है। सर्दियों में तेल आधारित क्लिंजर का प्रयोग करें, क्योंकि यह त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद करता है।" 

डॉ. डीजेएस तुला ने कहा, "गर्म पानी से स्नान करने से बचें और कम गर्म पानी का उपयोग करें। ठंडे पानी से स्नान करना त्वचा के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है। स्नान करने के बाद मॉइस्चराइजिंग आवश्यक है, अन्यथा त्वचा की सतह पर दरारें दिखाई दे सकती हैं।" 

उन्होंने कहा कि सर्दियों में लोग शरीर को गर्म रखने के लिए हीटर का इस्तेमाल करते हैं, पर यह त्वचा के सूखेपन का कारण बन सकता है, इसलिए हीटर के पास ज्यादा देर तक न बैठें और छोटे अंतराल के बाद खुले में जाएं। महिलाएं खूबसूरत दिखने के लिए ब्लीच का उपयोग करती हैं। ब्लीच एक भयानक रसायन है जो त्वचा से प्राकृतिक तेल को सोखता है, जिससे त्वचा छिल और जल जाती है। इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।

डॉ. तुला ने कहा कि यह सोच गलत है कि सर्दियों में सूरज कि किरणों से त्वचा को नुकसान नहीं पहुंचता है, ऐसा नहीं है और गर्मियों में सनस्क्रीन लगाना जितना आवश्यक है उतनी ही सर्दियों में भी है। बहुत से लोग मानते हैं कि सर्दियों के अंधेरे दिनों में सूर्य नहीं होता है, लेकिन वास्तव में सूर्य की हानिकारक यूवी किरणें बादलों को पार कर सकती हैं और नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए घर से बहार जाने से शरीर पर स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन लगाना जरूरी है।

उन्होंने कहा, "सर्दियों में फल, नट्स, हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करें। यह आपके पाचन तंत्र को मजबूत करती है और साथ-साथ आपकी त्वचा को चमकने में भी मदद करती है। त्वचा की सुंदरता के लिए गाजर का सेवन करें। यह विटामिन-ए का समृद्ध स्रोत है और यह आपके लिए सुंदरता के एजेंट जैसा है। मछली, अंगूर, एवोकैडो ब्रोकोली और बेरी त्वचा के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।"

--आईएएनएस