आईएलएफएस पर आरोप-पत्र अदालत ने स्वीकारा, आरबीआई को पता ही नहीं
Monday, 10 June 2019 08:42

  • Print
  • Email

नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने पिछले सप्ताह मौद्रिक समीक्षा के दौरान आईएलएंडएफएस मामले में एसएफआईओ की कोई जांच रिपोर्ट मिलने की बात से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, "हमें एसएफआईओ के आरोप-पत्र की जानकारी नहीं है। अगर कोई प्राधिकरण इस संबंध में हमें बताएंगे तो हम इसे देखेंगे।"

उसी समय (शुक्रवार को) मुंबई सत्र न्यायालय ने एसएफआईओ द्वारा दाखिल आरोप-पत्र को स्वीकार किया।

यह ठीक उसी तरह की स्थिति है, जैसे तर्जनी को अंगूठे की गतिविधि की जानकारी न हो।

इस आरोप-पत्र में आरबीआई की वित्त वर्ष 2016-17 की जांच रिपोर्ट को प्रकाश में लाया गया है, जिसमें आईएलएंडएफएस के प्रबंधन में सिलसिलेवार त्रुटियां और केंद्रीय बैंक द्वारा सुरक्षा के उपायों पर अमल करने में विचित्र ढंग से इनकार किए जाने का मामला उजागर हुआ है।

आरोप-पत्र में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि आरबीआई की आलोचना के बावजूद आईएलएंडएफएस की कार्यप्रणाली जारी रही। एसएफआईओ की माने तो अगर केंद्रीय बैंक ने इस रोग को भलीभांति जानने के बाद जल्द इसका इलाज किया होता तो इस गड़बड़ी को रोका जा सकता था।

विषाक्त आईएलएंडएफ वित्तीय सेवा (आईएफआईएन) मामले में जो दस्तावेज मिले हैं, उससे कंपनी के प्रबंधन की दिलचस्पी नहीं लेने की प्रवृत्ति का पता चलता है, क्योंकि इसने विनियामक आरबीआई के पर्यवेक्षण के आदेश को भी मानने से इनकार कर दिया।

कई मायने में रहस्यमयी समाज की करतूत की यह कहानी आईसीआईसीआई द्वारा पूरी तरह अनुपालन के सभी कदमों की अनदेखी करने जैसी है।

15 नवंबर, 2016 की गोपनीय जांच रिपोर्ट का आईएएनएस ने अवलोकन किया है, जिससे पता चलता है कि आरबीआई ने पाया कि आईएलएंडएफएस (सीआईबीआईएल जैसी सीआईसी-क्रेडिट इन्फोमेशन कंपनी) का लाभ 2.5 की निर्धारित सीमा के अधीन थी, लेकिन समूह का लाभ बढ़कर 7.14 हो गया, जो चिंता का विषय है। रिपोर्ट के अनुसार, "इस संबंध में आपको समूह का लाभ कम करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना सुपुर्द करने की भी सलाह दी जाती है।"

जांच रिपोर्ट में प्रबंधन संबंधी गंभीर चिंताएं सूचीबद्ध की गई हैं, लेकिन उनको पूरी राहत मिलने के बावजूद प्रबंधन ने इसे पूरी तरह नजरंदाज करने का रास्ता चुना।

उधर, कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय ने आरबीआई द्वारा उसकी अपनी जांच रिपोर्ट पर पूरी तरह अनुपालन नहीं करने के लिए उसकी आलोचना की है।

आरबीआई ने 31 मार्च, 2015 को कहा कि आईएलएंडएफएस फाइनेंशियल सर्विसेज ने बताया कि उसके स्वामित्व की 4,353.23 करोड़ रुपये की निधि घटकर 3,461.80 रुपये रह गई। इस तरह 891 करोड़ रुपये का अंतर मुक्त आरक्षित निधि से 400 करोड़ रुपये की रिडीमबल प्रिफेरेंस शेयर की प्रीमियम में कमी, 250 करोड़ रुपये के निवेश के लिए अतिरक्ति प्रावधान की पहचान और 182.5 करोड़ रुपये के निवेश पर प्राप्त ब्याज में बदलाव के कारण हुआ।

प्रिफेरेंस शेयर 2021 में रिडीमबल यानी शोधन योग्य थे। कंपनी द्वारा कुल 400 करोड़ रुपये के प्रिफेरेंस शेयर (निर्धारित लाभांश वाले शेयर) संग्रह किए गए थे।

आरबीआई ने कहा कि दरअसल, प्रिफेरेंस शेयर शोधन योग्य थे, इसलिए उसे मुक्त आरक्षित निधि का हिस्सा नहीं माना जा सकता है।

--आईएएनएस

Leave a comment

Make sure you enter all the required information, indicated by an asterisk (*). HTML code is not allowed.

Don't Miss