ममता का बंगाल विभाजन से इंकार

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनेस्ट्रेशन (जीटीए) के विघटन और राज्य के विभाजन से इंकार के बीच दार्जिलिंग के पहाड़ी इलाकों में जनजीवन लगातार तीसरे दिन भी अस्तव्यस्त रहा। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने 72 घंटे के बंद का आह्वान किया था।

जीजेएम ने अलग राज्य की मांग को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे से मुलाकात करने का फैसला किया है।

राज्य सरकार ने इसके साथ ही जीजेएम प्रमुख बिमल गुरुं ग का जीटीए के मुख्य कार्यकारी पद से इस्तीफा भी स्वीकार कर लिया है। जीटीए की स्थापना 2011 में जीजेएम, राज्य और केंद्र सरकार के समझौते के तहत एक निर्वाचित पहाड़ी विकास परिषद के तौर पर हुई थी।

ममता बनर्जी ने कहा, "जीटीए को भंग करने और राज्य के विभाजन का कोई सवाल ही नहीं है। इसका गठन एक त्रिपक्षीय समझौते के तहत हुआ था। इसके अलावा जीजेएम इस पर राजी था। जीटीएम के चुनाव विधिवत हुए थे और उसके प्रतिनिधि निर्वाचित हुए थे। पहाड़ी परिषद ने काम करना शुरू कर दिया था।"

तेलंगाना राज्य पर कांग्रेस के फैसले से उत्साहित जीजेएम ने भी अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन और तेज करने का निर्णय लिया है। उत्तरी बंगाल के दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी जिलों को मिलाकर नया गोरखालैंड राज्य बनाने की मांग है।

दूसरी ओर बनर्जी ने कांग्रेस और उसके कुछ नेताओं पर दार्जिलिंग की शांति में खलल डालने का आरोप लगाया है।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस और केंद्र विभाजनकारी ढंग से काम कर रहे हैं। तेलंगाना पर फैसला लेते समय उन्होंने जीटीए के तीन-चार लोगों को दिल्ली बुलाया था। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन लोगों पर जिम्मेदारी है वे गैर जिम्मेदारी से काम कर रहे हैं।

जीजेएम के महासचिव रोशन गिरी ने आईएएनएस से कहा कि बनर्जी जो कहना चाहती हैं उसे कहने का अधिकार है। लेकिन गोरखालैंड कभी भी बंगाल का हिस्सा नहीं था। गोरखालैंड का गठन बंगाल का विभाजन नहीं वरन केवल राज्य की मान्यता होगा।

जीजेएम ने आपात बैठक बुलाकर बुधवार को फैसला किया कि जीटीए के अन्य सदस्य भी इस्तीफा देंगे। पार्टी प्रवक्ता हरक बहादुर क्षेत्री के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार को शिंदे से मिलने के लिए रवाना होगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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