उत्तराखंड आपदा : राहत सामग्री बची है थोड़ी सी

देहरादून/नई दिल्ली: बाढ़ की भीषण त्रासदी से तबाह हुए उत्तराखंड को शुरू में चारो तरफ से मिलने वाली भारी राहत सामग्री में त्रासदी के लगभग एक महीने बाद अब थोड़ी सी बच गई है। राहत सामग्री में कमी के कारण गैर सरकारी संगठनों के सामने केदारनाथ के सुदूरवर्ती गांवों तथा अन्य आपदाग्रस्त इलाकों में फंसे हुए तथा त्रासदी से प्रभावित हजारों स्थानीय नागरिकों को राहत पहुंचाने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

वहां स्थानीय स्तर पर राहत कार्य में लगे तथा राहत सामग्री पहुंचाने वाले गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि त्रासदी के एक महीने बाद राहत के लिए मिलने वाला सामान कम ही बच गया है।

इसी तरह के एक गैर सरकारी संगठन 'हेल्पएज इंडिया' के भारत में अध्यक्ष अविनाश दत्ता ने आईएएनएस से कहा, "हम आसानी से भूल जाते हैं। सहानुभूति तो तेजी से घटी ही है, राहत सामग्री भी मामूली रह गई है। वहां अभी भी लोग ऐसी स्थिति में हैं कि उनके पास अपना स्टोव जलाने के लिए माचिस तक नहीं है, परिवार का कमाई करने वाला सदस्य नहीं रहा, कुछ लोगों का पूरा घर ही बह गया है, तो कुछ लोगों की आजीविका का जरिया ही खत्म हो चुका है। ऐसे में उन्हें हमारी सहायता की जरूरत है।"

वहां राहत कार्य में लगे गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि उनके पास मौजूद राहत सामग्री हद से हद 25 जुलाई तक समाप्त हो जाएगी, इसके बाद अनेक पीड़ित परिवारों को सूखे अनाज पर आश्रित रहना पड़ सकता है, क्योंकि उनके पास माचिस तक नहीं है।

उत्तराखंड के बाढ़ प्रभावित इलाकों में अभी हजारों लोग प्रकृति के प्रकोप से तो बचने में कामयाब रहे, लेकिन अभी भी वे मुख्य भूमि से कटे हुए हैं तथा कभी-कभार मिल जाने वाली राहत सामग्री के आसरे ही रह गए हैं।

अनेक गैर सरकारी संगठन उत्तराखंड के आपदा प्रभावित इन सुदूरवर्ती एवं पहुंच से दूर वाली जगहों पर राहत सामग्री पहुंचाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं।

इन गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि शुरू में तो राजनीतिक दलों एवं स्वयंसेवी समूहों के बीच राहत पहुंचाने की होड़ मची हुई थी, जिस कारण व्यवस्थित तरीके से राहत नहीं पहुंचाई जा सकी। यही वजह है कि सैकड़ों जरूरतमंदों को राहत मिल ही नहीं सकी।

'गूंज' के संस्थापक निदेशक अंशु गुप्ता ने आईएएनएस को बताया, "हमारे देश में आपदा की आशंका बनी रहती है, इसके बावजूद हमारी कोई तैयारी नहीं है। हम इस बारे में सोचते ही नहीं। राहत कार्य संचालित करने के लिए यहां कोई प्रणाली या नियंत्रक संस्था नहीं है। देहरादून और ऋषिकेश में कम से कम राहत सामग्री को रखने और फिर उसे व्यवस्थित तरीके से वितरित करने के लिए कम से कम एक नियंत्रक संगठन तो होना चाहिए।"

गैर सरकारी संगठनों ने राहत सामग्री के रूप में साड़ियों, कपड़ों, कंबलों, बरसात से बचने के लिए तिरपाल के शीट, गर्म कपड़ों, सूखे खाद्य पदार्थ जैसे, चीनी, आटा, चावल, मसाले, दूध पाउडर आदि के अतिरिक्त बर्तन, साबुन तथा जल को पेय योग्य बनाने वाली दवाओं की जरूरत बताई।

आपदा पीड़ितों को राहत पहुंचाने के इच्छुक लोग गूंज डॉट ऑर्ग, सेवदचिल्ड्रेनइंडिया डॉट ऑर्ग तथा हेल्पएजइंडिया डॉट ऑर्ग से जानकारी हासिल कर सकते हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

POPULAR ON IBN7.IN