प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना 'ग्रीन कुतुब' का टुकड़ा

देहरादून, 12 मार्च (आईएएनएस)| दिल्ली के महरौली में 12वीं सदी के अंत में जब गुलाम वंश के विजय के प्रतीक ऐतिहासिक कुतुबमीनार की नींव रखी जा रही थी, ठीक उसी समय आज के उत्तराखण्ड और उस समय के टिहरी गढ़वाल की पहाड़ियों पर देवदार के एक बीज ने अंगड़ाई लेनी शुरू की थी। अगले 700 सालों में यह शिशु पौधा विशालकाय वृक्ष बन गया।

इन वर्षो में उसकी ऊंचाई गुलाम वंश के सबसे प्रतापी शासक कुतुबुद्दीन ऐबक की विजय मीनार के बराबर 72.5 मीटर हो गई। इस भीमकाल वृक्ष को 'ग्रीन कुतुब' या हरित कुतुब नाम दिया गया और इसी वृक्ष का एक टुकड़ा यहां के संग्रहालय में प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित कर रहा है।

दुर्लभ देवदार का यह वृक्ष 1919-20 के आसपास धराशायी हुआ। उस समय इसकी उम्र 704 वर्ष हो चुकी थी। उस समय इसके घेरे का व्यास लगभग 2.75 मीटर था, जो कि कुतुबमीनार की शीर्ष के व्यास के बराबर है।

इसी वृक्ष का एक टुकड़ा केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के काष्ठ संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। इस टुकड़े का अर्धव्यास 140 सेंटीमीटर है। इसे देखने के लिए संग्रहालय में लागों का तांता लगा रहता है।

एफआरआई के निदेशक पी.पी भोजवैद ने आईएएनएस को बताया, "इस वृक्ष के घेरे की प्रदर्शनी सचमुच देखने लायक है। देश में इसके समान आकार, उम्र और आयाम की शायद ही कोई ज्ञात चीज मौजूद हो।"

इस दुर्लभ वृक्ष के गिरने का कारण ज्ञात नहीं है। अंग्रेजों के जमाने का यह संस्थान केवल इतना खुलासा करता है, इसके गिरने के बाद हाथियों और खच्चरों की मदद से इसके अवशेषों को ढोकर संस्थान तक लाया गया।

संग्रहालय के अधिकारी ने बताया, " एक यूरोपवासी वृक्ष को चार खंडों में अलग-अलग करने के बाद यहां लेकर आया क्योंकि संपूर्ण वृक्ष को लाने मे परेशानी होती। आज जो चीज हम यहां देखते है वह इन चार खंडों को मिलाकर एक गोलाकार लकड़ी का रूप दे दिया गया है।"

भोजवैद बताते है कि 1920 के दशक में एफआरआई में काम करने वाले यूरोपीय विशेषज्ञों ने वृक्ष की उम्र की गणना की थी। विशेषज्ञों ने इसके तने में पड़े छल्लों के आधार पर इसकी उम्र तय की थी। तने का एक छल्ला एक वर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। देवदार के इस वृक्ष में 700 से अधिक छल्ले हैं।

एफआरआई के वन पैथॉलजी खंड के प्रधान एन.एस.के. हर्ष के अनुसार, "यह वृक्ष सचमुच विशालकाय होगा। इसका फैलाव शानदार रहा होगा और यह देखने में अत्यंत आकर्षक होगा। यह 60-70 मीटर ऊंचा होगा। यह कुतुबमीनार अथवा एक 15 मंजिली इमारत जितना ऊंचा रहा होगा।"

संग्रहालय में 330 वर्ष पुराने सागौन की लकड़ी का भी एक तना रखा गया है। इसे केरल के पराम्बीकुलम से लाया गया है। इसके अलावा यहां दो हजार वर्ष पुराने काष्ठ का जीवाश्म को भी रखा गया है। इसे एक ब्रिटेनवासी मध्य प्रदेश के उज्जैन से लेकर आया था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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