यूपी चुनाव: 2014 में ही मायावती ने शुरू कर दी थी तैयारी

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती जब अपने जन्मदिन 15 जनवरी को पत्रकारों को संबोधित कर रही थीं तो करीब एक घंटे के बाद वहां मौजूद पत्रकार ऊबने लगे। पत्रकारों की हालत को भांपते हुए मायावती ने टिप्पणी की, “आप लोगों को केवल सुनना है, बोलूंगी केवल मैं।” उनकी चुटकी पर कमरा ठहाकों से गूंज उठा। 2014 के लोक सभा चुनाव में यूपी में एक भी सीट जीतने में विफल रही 61 वर्षीय बसपा प्रमुख का मिजाज बदला नजर आ रहा था। यूपी विधान सभा चुनाव से पहले मायावती पहले के उलट लगातार पत्रकार वार्ता कर रही हैं।

 

भले ही मुख्यधारा मीडिया में भाजपा और सपा को ज्यादा जगह मिल रही हो मायावती और उनकी पार्टी ने दो साल पहले से ही विधान सभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दी थी। बसपा ने मौजूदा चुनाव में सबसे पहले अपने प्रत्याशियों की लिस्ट जारी की। पार्टी ने सबसे पहले एक फरवरी को प्रचार अभियान शुरू कर दिया। 2014 में लोक सभा के पार्टी के लिए स्तब्ध कर देने वाले नतीजे आने के कुछ दिनों बाद ही बसपा ने विधान सभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। पार्टी ने तुरंत ही सभी इकाइयों को भंग कर दिया और नई इकाइयों में करीब आधी जगह युवाओं को दी। ज्यादातर जिलों में युवा पार्टी नेताओं को अध्यक्ष बनाया गया जिनकी औसत उम्र करीब 35 साल है। पार्टी ने ये कदम युवा दलित वोटों को जोड़ने के लिए उठाया क्योंकि उसे लग रहा था कि युवा दलित नरेंद्र मोदी की तरफ आकर्षित हो रहा है।

 

मायावती ने पार्टी के करीब एक दर्जन संयोजकों को पद से हटा दिया। पार्टी के महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गयी। कर्नाटक के पार्टी प्रमुख अशोक सिद्धार्थ और बिहार के पार्टी प्रमुख तिलक चंद्रा जैसे दलित नेताओं को यूपी वापस बुलाया गया। दोनों को क्रमशः सेंट्रल यूपी और बुंदेलखंड का प्रमुख बनाया गया। लोक सभा नतीजे आने के तीन महीने बाद अगस्त 2014 में मायावती ने पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में भाजपा और आरएसएस पर जमकर हमला किया। मायावती ने नरेंद्र मोदी सरकार के एक महीना, छह महीना, एक साल और दो साल पूरा होने पर प्रेस वार्ता की। इन सभी प्रेस वार्ताओं में उनके निशाने पर मोदी सरकार और संघ ही रहे। राज्य की अखिलेश यादव सरकार पर उन्होंने यदा-कदा ही हमला किया।

mayawati, bsp, up election बसपा ने यूपी विधान सभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की सूची करीब एक साल पहले तय कर ली थी।

मायावती ने अगड़ी जातियों को पार्टी से जोड़ने की रणनीति को बदलते हुए मुसलमानों की तरफ ध्यान देना शुरू किया। मायावती ने बार-बार कहा कि दलित और मुसलमान दोनों ही मोदी सरकार के निशाने पर हैं। मायावती मुसलमानों से लगातार अपील करती रही हैं कि वो सपा सरकार को वोट देकर अपना मत बर्बाद न करें। यूपी विधान सभा चुनाव के लिए बसपा ने 97 मुसलमानों, 87 दलितों, 66 ब्राह्मणों, 36 क्षत्रियों, 11 वैश्यों/कायस्थों और 106 पिछड़े वर्गों के लोगों को टिकट दिया है। यानी टिकट बंटवारे में भी उन्होंने वोट बैंक की गणित का पूरा ख्याल रखा।

 

बसपा ने विधान सभा चुनावों की घोषणा से करीब एक साल पहले ही अपने प्रत्याशियों के नाम तय कर लिए थे। पार्टी नेताओं के अनुसार उनके प्रत्याशी कई महीनों से क्षेत्र में सक्रिय हैं। बसपा के पास बूथ स्तर की कमेटी है जिसमें करीब एक दर्जन सदस्य होते हैं। करीब एक दर्जन बूथ कमेटी की निगरानी सेक्टर कमेटी करती है। सेक्टर कमेटी पर विधान सभा सेक्टर कमेटी निगरानी रखती है। इनके ऊपर करीब एक दर्जन संयोजक हैं जो पार्टी के सूबे के 18 डिविजन में पार्टी के कामकाज पर निगाह रखते हैं। इन 18 डिविजनों को 10 ज़ोन में बांटा गया है जिनका जिम्मा जोनल संयोजक पर होता है। जोनल संयोजक सीधे मायावती को रिपोर्ट करते हैं।

 

पिछले एक साल में बूथ, सेक्टर, विधान सभा और जिला स्तर पर पार्टी की तरफ से कम से कम तीन-तीन कार्यकर्ता कैंप लगाए गए। सभी कैंपों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने के लिए आयोजित भाईचारा बैठकों में बसपा के भावी प्रत्याशियों को लोगों से मिलवाया गया। बसपा नेताओं के अनुसार पार्टी के बूथ स्तर की कमेटी में हर जाति और धर्म के प्रतिनिधि हैं। मीरगंज से बसपा विधायक सुल्तान बेग कहते हैं, “हर विधान सभा में 300-324 गांव हैं। हम न केवल इन सभी गांवों में गए हैं बल्कि हमने हर विधान सभा को 12 भागों में बांटकर बैठकें भी की हैं। भाजपा और सपा प्रत्याशियों के लिए इतने कम समय में इन सभी गांवों में जाना संभव होगा, बैठक करना तो दूर की बात है?” बसपा साल 2007 के अपने नारे “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” के साथ ही इस बार भी प्रचार कर रही है। लेकिन इस बार पार्टी के विज्ञापनों में युवा, महिलाएं, कारोबारी, किसानों को प्रमुखता से जगह दी गयी है। पार्टी ने एक-एक मिनट के पांच प्रचार गीत गायक कैलाश खेर से गवाए हैं।

 

टीवी विज्ञापनों में पार्टी राज्य में कानून-व्यवस्था। पार्टी ने “अब लाएंगे बहनजी की सरकार”, “बहनजी को आने दो”, “सभी धर्मों का हाथ, बहनजी के साथ” और “सिंहासन पर माया बहन” जैसे नारे दिए हैं। बसपा ने पहली बार प्रचार के लिए सोशल मीडिया टीम भी नियुक्त की है। ये सोशल मीडिया अकाउंट आधिकारिक नहीं हैं लेकिन “पार्टी के समर्थकों” द्वारा चलाए जा रहे हैं। पार्टी के प्रचार की जिम्मेदारी संभाल रहे एक नेता स्वीकार करते हैं कि फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप पर उनके कई अकाउंट हैं। पार्टी ने प्रचार के लिए वीडियो, तस्वीरें और जीआईएफ बनवाए हैं। पार्टी की सोशल मीडिया टीम ने पिछले साल एक रैली के बाद “मायावतीनेक्सटसीएम” हैशटैग चलाया था। बसपा के एमएलसी सुनील कुमार चित्तौड़ कहते हैं कि पहले केवल भाजपा के समर्थक सोशल मीडिया पर थे अब बसपा समर्थक भी हैं। सुनील स्मार्टफोन की कम होती कीमतों को भी पार्टी समर्थकों के सोशल मीडिया पर बढ़ती मौजूदगी की एक वजह बताते हैं।

 

mayawati, bsp, up election, up assembly election बसपा नेता बताते हैं कि पार्टी के समर्थक अब सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं। 

सोशल मीडिया पर बसपा नोटबंदी और उससे हुई दिक्कतों का मुद्दा लगातार उठा रही है। मायावती ने 31 अक्टूबर 2015 को एक प्रेस वार्ता में घोषणा की कि वो अब पार्क और मूर्तियां नहीं बनवाएंगी। लोक सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद के 30 महीने में 35 प्रेस वार्ताएं कर चुकी हैं। इस दौरान वो करीब 200 बयान मीडिया को जारी कर चुकी हैं यानी हर पांचवे दिन एक बयान। बसपा नेता बताते हैं कि प्रेस वार्ताएं और बयान पार्टी की प्रचार रणनीति का हिस्सा हैं।

 

मायावती पहले अपने जन्मदिन पर रैली करती थीं लेकिन पिछले तीन जन्मदिन से वो प्रेस वार्ता कर रही हैं। उनके प्रेस नोट बुकलेट के तौर पर पार्टी कार्यकर्ताओं में बांटे गए। पिछले साल एक प्रेस वार्ता में रवायत के उलट मायावती ने अपनी बात खत्म करने के बाद पत्रकारों के सवालों का भी जवाब दिया। साफ है कि मायावती अपनी छवि बदलने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। सपा और कांग्रेस के गठजोड़ से भले ही मायावती की चुनावी गणित को थोड़ा झटका लगा हो बसपा अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं। पार्टी को भरोसा है कि पिछले दो सालों में जमीन पर की गयी उसकी मेहनत 11 मार्च को चुनावी नतीजे के रूप में सामने आएगी।

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