जयललिता के प्रति दीवानगी

दक्षिण भारत में जनता का नेताओं को समर्थन कई बार दीवानगी की हद पार कर जाता है। ताजा उदाहरण तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का है। उन्हें आय से अधिक संपत्ति के मामले में गत वर्ष जेल की सजा हुई थी, लेकिन अदालत के फैसले के बाद उन्होंने शनिवार को एक बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

अन्ना द्रमुक पार्टी के अनुसार, इससे पहले उनके जेल जाने से दुखी होकर दो सौ चवालिस लोगों ने आत्महत्या कर ली थी। इनके परिजनों को सात करोड़ से ज्यादा रुपये का मुआवजा दिया जाएगा।

दक्षिण भारतीय राज्यों से यह कोई पहला उदाहरण नहीं है। तमिलनाडु इस मामले में शीर्ष पर रहता है। यहां जयललिता ही नहीं करुणानिधि के समर्थक अपने नेताओं की गर्दिश पर इतने निराश होते हैं कि आत्महत्या का कदम उठा लेते हैं। ऐसा भी नहीं कि जयललिता या अन्य कोई नेता इन परिवारों को निजी तौर पर जानते, पहचानते होंगे। यह भी नहीं माना जा सकता कि इनके कारण उन परिवारों का जीवन स्तर बहुत बढ़ गया है। प्रशासन यहां भी सामान्य रूप से चलता है। इसीलिए प्राय: प्रत्येक चुनाव में हार-जीत का सिलसिला चलता है।

यह भी नहीं माना जा सकता कि दक्षिण भारत के लोगों में अपने नेता के प्रति बहुत दीवानगी होती है, इसीलिए सैकड़ों लोग अपने नेता की परेशानी देख नहीं पाते। यदि यह बात सही है तो आत्महत्या प्राय: गरीब तबके के लोग ही क्यों करते हैं। इन नेताओं की कृपा से पद तथा अन्य आर्थिक लाभ उठाने वाले दक्षिण भारतीय होने के बावजूद ऐसा कदम नहीं उठाते।

यहां तक कि उनकी सरकार के मंत्री और परिजन भी स्वभाविक दुख के बावजूद संयमित बने रहते हैं। फिर सुदूर गांव में रहने वाला जान क्यों दे देता है। यह बात समझ से परे है।

कुछ वर्ष पहले आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हुआ था। उस समय भी आंध्र से कई आत्महत्याओं की खबर मिली थी, जबकि खुद उनके पुत्र जगन मोहन राजनीतिक उत्तराधिकार संभालने की तैयारी कर रहे थे। अपने पिता की अन्तिम यात्रा में वह खुले वाहन पर सबका अभिवादन करते चल रहे थे। कुछ ही दिन बाद उनहोंने मुख्यमंत्री पद का दावा कर दिया था।

ये बात अलग है कि कांग्रेस हाईकमान ने इसे मंजूर नहीं किया था। जगनमोहन इससे भी निराश थे। लेकिन आत्महत्या करने वाले अधिकांश लोग ऐसे थे, जिन पर 'कोउ नृप होय हमै का हानी..' चरितार्थ होता था।

ऐसे में यह शोध का विषय है कि गरीब ही इतने विचलित क्यों हो जाते हैं। इसे दक्षिण भारत की एक विशेषता कैसे माना जा सकता है, यदि यह बात सच होती तो सत्ता से लाभान्वित या राजनीतिक उत्तराधिकारी इससे प्रभावित क्यों नहीं होते।

कुछ भी हो, धनी हो या निर्धन, व्यक्ति की वास्तविक परीक्षा आपदकाल में होती है। इसमें धैर्य रखने की आवश्यकता है। ऐसे मौकों पर समाज की जिम्मेदारी भी होती है। समाज का सौहार्द, सद्भाव और संबल उदास व्यक्ति का मनोबल बढ़ाता है। आधुनिक जीवन शैली में इसका महत्व कम हुआ है। इसीलिए अनेक प्रकार की सामाजिक विकृति बढ़ रही है।

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