झारखंड की संस्कृति की पहचान है 'मुर्गा लड़ाई'

वैसे तो आपने कई बार जानवरों और पक्षियों को लड़ते-झगड़ते देखा होगा परंतु झारखंड के बाजारों और मेलों में 'मुर्गा लड़ाई' का खास प्रकार का आयोजन किया जाता है। कई इलाकों में प्रतियोगिता आयोजित होती है।

लड़ने के लिए मुर्गा को खास तौर पर न केवल प्रशिक्षण दिया जाता है, बल्कि उसके खान-पान पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।

झारखंड के लोहरदगा, गुमला, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सिमडेगा सहित कई जिलों में इस लड़ाई को आदिवासियों की संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है। मुर्गा लड़ाई के लिए कई क्षेत्रों में मुर्गा बाजार लगाया जाता है। इतिहास के पन्नों में मुर्गा लड़ाई की कोई प्रमाणिक जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन आदिवासी समाज में मुर्गा लड़ाई कई पीढ़ियों से आम जिंदगी का मनोरंक हिस्सा बना हुआ है।

मुर्गा लड़ाई के विशेषज्ञ अशोक सिंह कहते हैं कि मुर्गा लड़ाई पूर्व में मनोरंजन का हिस्सा हुआ करता था जहां लोग अपने पसंद के मुर्गो पर दांव भी लगाते थे। अब इस लड़ाई के नाम पर जुआ शुरू हो गया है। इस लड़ाई से आदिवासी संस्कृति की पहचान गुम होती जा रही है।

अपने मुगरे को लड़ाई के लिए तैयार कर रहे गुमला के अवधेश भगत बताते हैं कि लड़ाई में प्रशिक्षित मुर्गे उतारे जाते हैं। लड़ने के लिए तैयार मुर्गे के एक पैर में अंग्रेजी के अच्छर 'यू' आकार का एक हथियार बंधा हुआ होता है जिसे 'कत्थी' कहा जाता है। ऐसा नहीं यह कत्थी कोई व्यक्ति बांध सकता है। इसके बांधने की भी कला है। कतथी बांधने वालों को कातकीर कहा जाता है जो इस कला के माहिर होते हैं।

कत्थी बांधने के बाद मुर्गे लड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं। जब दो मुर्गे लड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं तो दर्शक के रूप में उपस्थित लोग अपने मनपसंद मुर्गे पर दांव लगाते हैं। मुर्गे की लड़ाई आमतौर पर 10 मिनट तक चलती है। इस दौरान मुर्गे को उत्साहित करने के लिए मुर्गाबाज (मुर्गा का मालिक) तरह-तरह का आवाज निकालता रहता है, जिसके बद मुर्गा और खतरनाक हो जाता है।

मुर्गे आपस में कत्थी द्वारा एक दूसरे पर वार करते रहते हैं। इस दौरान मुर्गा लहुलूहान हो जाता है। कई मौकों पर पर तो कत्थी से मुर्गे की गर्दन तक कट जाती है। मुर्गो की लड़ाई तभी समाप्त होती है जब एक मुर्गा घायल हो जाए या मैदान छोड़कर भाग जाए।

एक अन्य मुर्गाबाज ने बताया कि मुर्गो को विशेष रूप से तैयार करने के लिए उसको पौष्टिक खाना तो दिया ही जाता है, कई बार ऐसे मुर्गो को मांस भी खिलाया जाता है। लड़ाकू बनाने के लिए मुर्गो को ना केवल मादा मुर्गे से दूर रखा जाता है, बल्कि उसे कई दिनों तक अंधेरे में भी रखा जाता है।

लोहरदगा के पत्रकार राकेश कुमार सिन्हा कहते हैं कि मुर्गा बाजार आदिवासी समाज की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। पूर्व में इसका आयोजन मनोरंजन के लिए किया जाता था, परंतु अब धनलोलुप लोगों ने आदिवासियों की इस गौरवशाली परंपरा को विकृत कर दिया है। आज मुर्गा बाजार जुआ, सट्टा तथा शराबखोरी का अड्डा बनकर रह गया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

POPULAR ON IBN7.IN