'कश्मीर को जलवायु परिवर्तन से बचाएं'

कोलकाता:  आतंकवाद को लेकर हाल में सुर्खियों में रहे कश्मीर के कुछ युवा फिल्मकारों ने अपनी लघु फिल्मों के जरिये घाटी की खूबसूरती को दर्शाते हुए इसे जलवायु परिवर्तन के प्रकोपों से बचाने की अपील की है। हाल में संपन्न सातवें विज्ञान फिल्मोत्सव में कम से कम दो फिल्में दिखाई गईं, जिनका विषय कश्मीर में जलवायु परिवर्तन था।

जलाल-उद दीन बाबा की 'ग्लोबल वार्निग : कश्मीर चैप्टर' तीन बाग मालिकों की कहानी बयां करती है, जो जलवायु परिवर्तन के 'पीड़ित' रहे हैं।

बाबा ने कहा कि मौसम में उतार-चढ़ाव, देर से सर्दियों का आना और असमान बर्फबारी उनके बगीचों व व्यापार को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं या आंशिक रूप से नुकसान पहुंचाते हैं।

बाबा को फिल्मोत्सव में पुरस्कार भी दिया गया। उन्होंने कहा, "सितंबर 2014 में आई बाढ़ ग्लोबल वाìमग के खिलाफ चेतावनी है। हम लोगों से कश्मीर की सुंदरता और फूलों को बचाने की अपील करते हैं।"

'क्लाइमेट चेंज एडैप्टेशन इन लिद्दर वैली' वृत्तचित्र में फिल्मकार तारीक अब्दुला ने दिखाया है कि कैसे लिद्दर घाटी के लोगों ने खुद को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढाल लिया है।

यह कश्मीर विश्वविद्यालय के पृथ्वी विज्ञान विभाग के विद्यार्थियों के शोध पर आधारित है।

यह इस तथ्य को दर्शाता है कि पिछले 40 सालों में लिद्दर घाटी में कोलाहाई ग्लेशियर और सिंचाई में 18 फीसदी की कमी आई है।

व्यापक अनुसंधान के बाद फिल्म निर्माताओं ने कश्मीर हिमालय क्षेत्र में कई बदलाव देखे, जिनमें तापमान में नियमित वृद्धि, ग्लेशियरों में कमी, अनिश्चित और अल्प वर्षा आदि शामिल हैं।

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