गांधीजी का गान : सदियों पुराने भजन पर नया वृत्तचित्र

शिकागो : गुजरात के परम पूजनीय कवि-दार्शनिक नरसिंह मेहता का लिखा वही गीत जिसे महात्मा गांधी ने अपने जीवन की प्रेरक शक्ति माना था, अब एक आने वाले वृत्तचित्र का विषय है।

'गांधी का गीत' शीर्षक से बन रहे वृत्तचित्र का लेखन और निर्देशन शिकागो में रह रहे पत्रकार एवं लेखक मयंक छाया कर रहे हैं। गुजरात के जूनागढ़ और अन्य स्थानों पर शूटिंग स्थलों के साथ अगले कुछ सप्ताह में इस वृत्तचित्र का निर्माण शुरू हो जाएगा। जिन स्थलों पर शूटिंग की जानी है, वहां कवि मेहता ने अपनी जिंदगी के दिन गुजारे थे और कृष्ण को संबोधित अपना कुछ अत्यंत लोकप्रिय आध्यात्मिक चिंतन समाने लाया था।

छाया ने आईएएनएस से कहा, "67 वर्ष पहले इसी दिन गांधीजी की हत्या हुई थी, तब से भारतीयों की पीढ़ियां यही सोचते हुए बड़ी हुई है 'वैष्णवजन तो..' को उन्होंने ही लिखा था। यह इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कृति अपने रचनाकार से कहीं ज्यादा प्रचारित हो गई है। यह खास भजन इस चेतना में खास है कि यह अपने अंदर निहित उस अनसुलझे सवाल में अभी तक बना हुआ है कि एक मनुष्य को कौन-सा गुण सभ्य बनाता है?"

'गांधी का गीत' एक लंबा वृत्तचित्र फीचर होगा जो मेहता को सामने लाने और विश्व के बारे में उनके अगाध दर्शन पर स्पष्ट रूप से केंद्रित होगा। इसका उद्देश्य दुनिया के दर्शकों का ध्यान आकृष्ट करना है। भारतीय इतिहास में 800 से 1700 ईवी के बीच मध्यकाल के दौरान भक्ति आंदोलन चरम पर पहुंचा और उसी दौर में प्रसिद्धि की दृष्टि से गुमनाम समझे जाने जाने वाले मेहता 1414 और 1481 के बीच व्यापक रूप से लोकचेतना में बने रहे।

परंपराओं में भक्ति आंदोलन काल के चर्चित चेहरों में मेहता प्रमुख समाज सुधारक के तौर पर भी उच्च आसन पर गिने जाते हैं। उन्होंने अपने काव्य शक्ति का इस्तेमाल जाति के रूढ़ और वर्गीय बंधनों को तोड़ने में किया।

'गांधी का गीत' शीर्षक से वृत्तचित्र वैश्विक लोकप्रियता और स्वीकार्यता के कारण 'वैष्णव जन तो' पर केंद्रित रहेगा, लेकिन इसका मुख्य जोर मेहता को कवि, सुधारक और एक ऐसी हस्ती जिसने दमनकारी समाजिक मूल्यों का तिरस्कार किया और जाति विभाजन के शिकार लोगों के बीच समानता स्थापित करने के लिए जीवन भर काम करते रहे।

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