गुजरात : जातिगत समीकरणों को साधने के चक्कर में राहुल गांधी कहीं इन मोर्चों को भूलने की गलती तो नहीं कर रहे?

गांधीनगर: गुजरात विधानसभा चुनाव   प्रचार  में रणनीतिक स्तर पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच हर दांव आजमाया जा रहा है. शंकर सिंह वाघेला का झटका लगने के बाद संभली कांग्रेस ने बीजेपी के अब तक सारे दांव फेल कर दिए हैं. पाटीदार आंदोलन के नेताओं को अपने पाले में करने के चक्कर में बीजेपी की अच्छी खासी फजीहत हो रही है. पाटीदार नेता नरेश पटेल ने आरोप लगा दिया है कि बीजेपी उसे 1 करोड़ रुपये का आफर दे रही है. उनके इस खुलासे पर बीजेपी नेता साफ तौर पर कुछ भी नहीं कर रहे हैं और कांग्रेस का खेल करार दे दिया. गांधीनगर की रैली में राहुल गांधी ने इसको मुद्दा बनाया और ऐलान करते हुए कहा कि यह गुजरात की आवाज है इसे न दबाया जा सकता है और न खरीदा जा सकता है. राहुल गांधी ने अभी तक दिये भाषणों से बीजेपी को और सकते में डाल रखा है. वो हर रैली में जीएसटी और नोटबंदी का मुद्दा बना रहे हैं. जीएसटी को तो उन्होंने 'गब्बर सिंह टैक्स' कह डाला. ऐसे जुमले अभी तक नरेंद्र मोदी ही गढ़ते नजर आते थे.

दलित-ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर भी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. उन्होंने गुजरात में दलितों के बीच बहुत काम किया है जिसकी तारीफ भी होती. माना जाता है कि दलितों में उनका अच्छा खासा प्रभाव है हालांकि यह जानने के लिए चुनाव नतीजों का इंतजार करना होगा. दूसरी एक दूसरे दलित नेता जिग्नेश वाणी भी एक चेहरा बनकर उभरे हैं जिन्होंने उना कांड का काफी विरोध किया था. हार्दिक पटेल सूरत में पाटीदारों के आरक्षण के लिए हुई रैली लाठीचार्ज के बाद बीजेपी को हटाने की कसम खा चुके हैं. बात करें इन तीनों नेताओं के प्रभाव की तो हार्दिक पटेल जिन पाटीदारों की बात कर रहे हैं उनकी संख्या गुजरात में 20 फीसदी है, इन्हें बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक कहा जाता है. अल्पेश ठाकोर ओबीसी समुदाय से आते हैं. जिनकी संख्या 54 फीसदी है. गुजरात में ओबीसी वोटबैंक ही हर बार जीत सुनिश्चित करता है. वहीं जिग्नेश मेवानी दलित समुदाय से आते हैं जिनकी संख्या 6 फीसदी है. मतलब साफ है कि अभी तक के समीकरण कांग्रेस के पक्ष में जाते दिखाई दे रहे हैं. लेकिन यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि गुजरात 22 सालों से बीजेपी का गढ़ है. यहां का वोटर कितना भी नाराज हो वोट आखिर कमल को ही जाता है. इस बात को विपक्षी भी स्वीकार करते हैं. कांग्रेस के सामने अभी गुजरात में कई चुनौतियां हैं. 

'विकास पागल हो गया' 
'गुजरात मॉडल' का पार्टी ने पूरे देश में डंका पीटा है. कांग्रेस की रणनीति है कि बीजेपी को विकास के ही मुद्दे पर घेर लिया जाए. सोशल मीडिया में विकास पागल हो गया नाम से एक अभियान शुरू किया गया जिसमें सत्ताधारी पार्टी के विकास के नाम पर किए गए कामों की कमियां गिनाना शुरू किया गया. वहीं बीजेपी के रणनीतिकारों ने बजाए इसका जवाब देने के विकास कामों को ही एजेंडा बनाया और पीएम मोदी के दौरों में परियोजनाओं का उद्घाटन या शिलान्यास किया गया. पहला 14 सितंबर को जापान के पीएम शिंजो आबे के साथ पीएम मोदी ने बुलेट ट्रेन की परियोजना की आधारशिला रखी. इसके बाद इसके तीन दिन बाद ही सरदार सरोवर बांध को पीएम मोदी ने समर्पित किया. वडोदरा से वाराणसी के बीच महामना एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई और इसके बाद भावनगर के घोघा और भरूच के दहेज के बीच 650 करोड़ रुपये की रोल-ऑन रोल ऑफ (रो-रो) फेरी सेवा की शुरुआत. मतलब साफ है बीजेपी इनको चुनाव प्रचार में जरूर भुनाएगी. कांग्रेस के सामने चुनौती है कि उसे जीएसटी से नाराज व्यापारियों, बेरोजगार युवाओं, दलितों और किसानों के गुस्से को बनाए रखना है. 

'बागियों' और 'वोट कटवा' से सावधान
माना जा रहा है कि बीजेपी बड़ी संख्या में इस बार राज्य में कांग्रेस के बागियों को टिकट देने जा रही है. यह प्रयोग वह दिल्ली नगरनिगम के चुनाव में कर चुकी है. इसके अलावा शंकर सिंह वाघेला जैसे बड़े नेता अपने समर्थकों के साथ जन विकल्प मोर्चे को बना चुके हैं. वह चुनाव में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की रणनीति पर ही काम कर रहे हैं. आम आदमी पार्टी भी गुजरात में विधानसभा चुनाव लड़ेगी. वहीं शरद पवार की पार्टी एनसीपी भी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है तो यही से समीकण साफ है कि कांग्रेस के सामने सिर्फ बीजेपी ही नहीं है आम आदमी पार्टी, वाघेला, और एनसीपी की ओर से भी मोर्चा खुला हुआ है.  यानी कांग्रेस को AVN( आम आदमी पार्टी, वाघेला और एनसीपी) फॉर्मूले से भी निपटना होगा. कहीं बीजेपी भी इसी पर फॉर्मूले को लेकर तो रणनीति नहीं बना रही है. 

ध्रुवीकरण पर बनानी होगी रणनीति
गुजरात इस मामले में हमेशा से ही संवेदनशील रहा है. कांग्रेस को इसको लेकर पुख्ता इंतजाम करने होंगे. उसके नेताओं और उम्मीदवारों को हर बयान संभलकर बोलना होगा क्योंकि इस मोर्चे पर एक भी गलती सभी समीकरणों को एक पल में बिगाड़ने में देर नहीं लगाएगी. 


मोदी के अति विरोध से बचना होगा
राहुल गांधी ने अभी तक अपने चुनाव प्रचार में जितने भी बाते कही हैं वह पीएम मोदी की नीतियों पर निशाना साधते हुए कही हैं. अगर बीजेपी उनके 'मोदी विरोध' को 'गुजरात विरोध' में बदलने में कामयाब हो जाती है, जैसा कि पहले भी ऐसा हो चुका है तो कांग्रेस के लिए मुश्किल हो सकती है. इसलिए राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के दूसरे प्रचारकों को स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा जोर देना चाहिए क्योंकि राज्यों में सत्ता विरोधी लहर स्थानीय मुद्दों पर होती है न कि राष्ट्रीय मुद्दों पर.

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