पेट भरने के लिए मजदूरी कर रही सैनिक की विधवा

रायपुर, 12 मार्च (आईएएनएस/वीएनएस)। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में वसंतपुर निवासी 60 वर्षीय शारदा देवी के पति दामोदर दास 1984 में शहीद हो गए थे। तब से अब तक वह पेंशन के लिए भटक रही है। आज उनके पास रहने को घर नहीं है। रोटी का ठिकाना रहीं। खुद शारदा देवी ने बताया कि पति की मौत के बाद भोपाल गैस कांड में उन्होंने अपने दोनों बेटे गंवा दिए। अब मजदूरी कर पेट पाल रही हैं। गौरतलब है कि शारदा देवी का निवास प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह के निर्वाचन क्षेत्र में ही आता है।

सैनिक की विधवा ने वीएनएस को बताया कि कभी पड़ोसी के घर तो कभी सड़क पर ही रात बीत जाती है। एक-एक दिन सौ साल जैसा लगता है। पेंशन के लिए कई बार चक्कर लगाए। सरकार से गुहार लगाई पर किसी ने न सुनी। मुझे अभी भी पति की कुबार्नी याद आती है। कुछ धुंधला सा।

तब (1977-78) नागालैंड में उनकी तैनाती थी। सेना की टुकड़ियों को गन व हथियार सप्लाई करने जंगल निकले थे। बीच में ही हमलावरों ने घेर लिया। इस घटना में उनके दाहिने हाथ में गोलियां लगीं। गोलियां लगने के बाद सेना सेवा क्राप अभिलेख, बेंगलुरू साउथ ने उनका इलाज करवाया और घर भेज दिया। घर आने के कुछ महीने बाद ही उनके हाथ में दर्द शुरू हो गया। धीरे-धीरे उसने कैंसर का रूप ले लिया और वे चल बसे।

उसने बताया, "पति के मौत के बाद मैंने पेंशन के लिए एक बार बेंगलुरू और एक बार भोपाल गई, लेकिन किसी ने परेशानी नहीं समझी। इधर आर्थिक तंगी के चलते हिम्मत ने जवाब दे दिया। मैं थक गई थी। इसलिए शिकायत भी नहीं की। शुक्रवार को अधिकारियों के निरीक्षण की जानकारी मिली तो शनिवार को एक बार फिर फरियाद लेकर पहुंची इस आस के साथ कि उनको उनका हक मिलेगा।"

बहरहाल, पति और पुत्रों को खो चुकी इस गरीब बेवा की गुहार सरकार कब सुनती है और शारदा देवी को उनका हक कब तक मिलता है, यह खुद सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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