बिहार में शराबबंदी के बाद बड़े अपराधों में 13 फीसदी बढ़ोतरी

हाल ही में बिहार यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराब कि राज्य में बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की सराहना की थी।

प्रधानमंत्री ने कहा था, "मैं शराबबंदी का अभियान चलाने के लिए नीतीश कुमार को दिल से बधाई देता हूं। लेकिन शराबबंदी सिर्फ नीतीश या किसी एक सरकार की कोशिशों से सफल नहीं हो सकती। सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों को इसे जन-जन का आंदोलन बनाने के लिए भागीदारी करनी होगी।"

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष अप्रैल में नीतीश कुमार ने बिहार में शराब की बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। नीतीश ने चुनाव से पहले शराबबंदी का वादा किया था।

शराबबंदी के 30 दिनों के बाद नीतीश ने दावा किया था कि अपराधों में 27 फीसदी तक की कमी आई है। यह आंकड़ा नीतीश ने अप्रैल, 2015 से अप्रैल 2016 के बीच के अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के आधार पर दिया था।

बिहार में शराबबंदी के अब नौ महीने मतलब 270 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन इंडियास्पेंड ने बिहार पुलिस के अपराध रिकॉर्ड के आधार पर कहा है कि अप्रैल से अक्टूबर, 2016 के बीच सं™ोय अपराधों में 13 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

अप्रैल में जहां ऐसे अपराधों की संख्या 14,279 थी, जिनकी जांच के लिए पुलिस को दंडाधिकारी के आदेश की जरूरत नहीं पड़ती। वहीं अक्टूबर में यह संख्या बढ़कर 16,153 हो गई।

दूसरे शब्दों में कहें तो शराबबंदी का अपराध में कमी से कोई संबंध नहीं दिखाई देता। गौरतलब है कि पटना उच्च न्यायालय ने शराबबंदी को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार से वंचित करने वाला बताया था।

इंडियास्पेंड की मई, 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, इन आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि इस दौरान अपराधियों को सजा दिए जाने में 68 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। 2010 में जहां 14,311 अपराधियों को सजा सुनाई गई, वहीं 2015 में सिर्फ 4,513 अपराधियों को सजा दी गई। इसी अवधि में सं™ोय अपराधों में 42 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

शराबबंदी के दौरान हत्या, दुष्कर्म, अपहरण और दंगे-फसाद जैसे संगीन अपराधों में वृद्धि हुई है।

इंडियास्पेंड की मई, 2016 की रिपोर्ट के अनुसार ही कम आबादी वाले अपेक्षाकृत धनी राज्यों, जैसे गुजरात, केरल, राजस्थान और मध्य प्रदेश की अपेक्षा बिहार में अपराध दर कम रहा है, हालांकि इसके पीछे कारण अपराधों की शिकायत न करना रहा।

पटना उच्च न्यायालय ने सितंबर, 2016 में शराबबंदी के फैसले को रद्द कर दिया था और बिहार आबकारी (संशोधन) विधेयक-2016 को अवैध करार दिया था। नए विधेयक में शराब का भंडार करने या सेवन करने का अपराधी पाए जाने पर परिवार के सभी वयस्क सदस्यों के खिलाफ जेल की सजा का प्रावधान रखा गया था।

शराबबंदी का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को 10 वर्ष तक की जेल और 10 लाख रुपये तक की सजा का प्रावधान है। उल्लेखनीय है कि अदालतों द्वारा सरकार के किसी विधेयक पर रोक लगाया जाता है, तो विधानमंडल की मंजूरी से उस पर कानून बनाया जा सकता है, जिससे कि अदालत उसमें हस्तक्षेप न कर सके। बिहार में भी यही हुआ।

पटना उच्च न्यायालय का आदेश आने के दो दिनों के भीतर बिहार सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर नया कानून बिहार निषेध एवं आबकारी अधिनियम-2016 बना दिया।

(आंकड़ा आधारित, गैर लाभकारी, लोकहित पत्रकारिता मंच, इंडियास्पेंड के साथ एक व्यवस्था के तहत। ये इंडियास्पेंड के निजी विचार हैं)

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