पाकिस्तान के लिए सरबजीत हमेशा मनजीत ही रहा

भारत का सरबजीत सिंह पाकिस्तान में मनजीत सिंह बना रहा। लाहौर की जेल में क्रूरतापूर्ण हमले में घायल जिस आदमी की गुरुवार को मौत हो गई और शुक्रवार को जिसका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया उसकी कहानी इन्हीं नामों के बीच घूमती रही। उसे वहां मनजीत के नाम से फांसी की सजा सुनाई गई थी।

उनके परिवार के लोगों के मुताबिक वे सरबजीत सिंह थे जो वर्ष 1990 में जब वे 26 वर्ष के थे तब नशे की हालत में गलती से पाकिस्तान की सीमा में दाखिल हो गए थे। पाकिस्तान के लिए वे मनजीत थे जिसने लाहौर और मुल्तान में आतंकवादी हमले किए जिसमें 14 लोग मारे गए थे।

करीब 23 वर्षो तक सरबजीत सिंह दी गई गलत पहचान को धोने का प्रयास करते रहे। इस प्रयास में वे आंशिक रूप से कामयाब भी हुए।

अपने गृह कस्बे में शुक्रवार को सरबजीत की असली नाम के साथ आखिरी यात्रा निकली। अपने देश में शहीद का दर्जा पा कर।

लेकिन नाम का दोहरापन खत्म नहीं होता।

यहां तक कि गुरुवार की सुबह जब उनका निधन हो गया तब पाकिस्तान के अधिकारियों और वहां की मीडिया ने कहा कि आतंकवादी मनजीत सिंह की मौत हो गई।

अपने पत्रों और वकील के माध्यम से सरबजीत पाकिस्तान में हर किसी को यही कहते रहे कि वे मनजीत नहीं हैं और किसी आतंकवादी गतिविधि में शामिल नहीं रहे।

लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी और उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई।

उनके परिवार ने हमेशा यही कहा कि सरबजीत पहचान में हुई चूक का मामला है।

मौत के बाद वे अपने असली नाम के साथ चिता पर शांति के साथ लेटे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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