निजता का अधिकार: SC के फैसले का सोनिया गांधी ने किया स्वागत

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने निजता के अधिकार पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुआ गुरुवार को कहा कि यह वैयक्तिक अधिकारों एवं मानवीय गरिमा के नये युग का संदेशवाहक है तथा आम आदमी के जीवन में राज्य एवं उसकी एजेंसियों द्वारा की जा रही ‘‘निरंकुश घुसपैठ एवं निगरानी’’ पर प्रहार है। निर्णय का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी एवं उसकी सरकारें तथा विपक्षी दल इस अधिकार के पक्ष तथा इनको सीमित करने के इस (भाजपा की ) सरकार के अहंकारपूर्ण रवैये के खिलाफ अदालत एवं संसद में आवाज उठा चुके हैं।

सोनिया ने एक बयान में कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय का निजता का मूलभूत अधिकार के बारे में आया फैसला वैयक्तिक अधिकार, वैयक्तिक स्वतंत्रता एवं मानवीय गरिमा के एक नये युग का संदेशवाहक है। यह आम आदमी के जीवन में राज्य एवं उसकी एजेंसियों द्वारा की जा रही निरंकुश घुसपैठ एवं निगरानी के खिलाफ प्रहार है।’’ कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी एवं उनकी राज्य सरकारों ने अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर अदालत एवं संसद में वर्तमान सरकार द्वारा निजता के अधिकार एवं सभी भारतीयों की गरिमा को सीमित करने के अहंकारपूर्ण प्रयासों का विरोध किया और इस अधिकार के पक्ष में आवाज उठायी।

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है और यह जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय पीठ ने एक मत से यह फैसला दिया। 547 पन्नों में दिये गये इस फैसले से मौलिक अधिकारों की परिभाषा में एक नया आयाम जुड़ा है। सबसे खास बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच के सदस्य डी वाई चन्द्रचूड ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताकर अपने पिता जस्टिस वाई वी चन्द्रचूड के एक अहम फैसले को पलट दिया है, जो उन्होंने 1975 में एडीएम जबलपुर वर्सेस शिवकांत शुक्ला के मामले में दिया।

अपने पिता के फैसले के विपरित जाते हुए डीवाई चन्द्रचूड ने कहा कि उस दौरान चार जजों द्वारा बहुमत में दिये गये फैसले में कई खामियां थी। 24 अगस्त को जस्टिस वाई वी चन्द्रचूड ने अपने फैसले में लिखा, ‘जीवन और व्यक्तिगत आजादी मानव के अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। जैसा कि केशवानन्द भारती मामले में कहा गया है ये अधिकार मनुष्य को आदिकाल से मिले हुएे हैं। ये अधिकार प्रकृति के कानून का हिस्सा हैं।’

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