मणिपुर में जवानों द्वारा किए गए कथित बलात्कार पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कराएगा SIT से जांच

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (18 अप्रैल) को मणिपुर में हुए बलात्कार के तीन कथित मामलों की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) के गठन का आदेश दिया। इनमें से एक मामले में भारतीय सुरक्षा बल के जवानों पर एक नाबालिग के बलात्कार का आरोप है। जस्टिस मदन बी लोकुर और उदय यू ललित की पीठ ने एसआईटी के गठन के लिए केंद्र सरकार से सीबीआई के डीआईजी स्तर के पांच अधिकारियों या एडीजी रैंक के पुलिस अधिकारियों के नाम देना के लिए कहा है। मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर्स एक्ट (आफ्सपा) लागू है जिसके तहत सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं।

 

मणिपुर में बीस साल के दौरान हुई कथित 1528 फर्जी मुठभेड़ों के मामले में सेना की तरफ से सर्वोच्च अदालत में पेश भारत के एटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी को ये बुधवार (19 अप्रैल) को ये नाम देने के लिए कहा गया है।  बुधवार को ही सर्वोच्च अदालत राज्य सरकार और याचिकाकर्ता एक्स्ट्रा जुडिशियल एक्जिक्यूशन विक्टिम फेमिलीज एसोसिएशन द्वारा सुझाए गए एसआईटी सदस्यों के नाम पर भी विचार करेगी।

 

जिन तीन मामलों की सुप्रीम कोर्ट जांच कराने जा रहा है उनमें भारतीय सेना और अर्ध-सैनिक बल असम राइफल्स के जवान आरोपी हैं। पहले मामले में चार अक्टूबर 2003 को एक 13 वर्षीय बच्ची का दो जवानों ने कथित तौर पर बलात्करा किया। पीड़िता ने कथित तौर पर घटना के कुछ घंटे बाद आत्महत्या कर ली थी। अन्य दो मामले मणिपुरी लड़कियों टी मनोरमा और एलडी रेंगतुईवान की साल 2004 में की गई कथित प्रताड़ना और हिरासत में मौत से जुड़े हैं। मनोरमा मामला राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में रहा था।

 

 

 

सर्वोच्च अदालत ने सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी और मणिपुर सरकार द्वारा गठित जांच आयोग की रिपोर्टों को देखने के बाद कहा कि सरकार ने सेना और अर्ध-सैनिक बलों के आरोपी होने की बिना पर केवल अपनी “लाचारी” व्यक्त की है। वहीं आर्मी की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी ने आरोपियों को क्लीन चिट दी है। सर्वोच्च अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पूछा, “क्या आपमें (राज्य सरकार) और उनमें (सेना) में कोई अघोषित समझौता है कि आप उनके इलाके में जांच नहीं करेंगे।” अदालत ने कहा, “यहां एक 13 साल की लड़की जो रबर फार्म में काम करती थी। ऐसा कोई आरोप नहीं है कि वो घुसपैठिया थी। दो लोग आते हैं और उसका रेप करते हैं। वो अपनी माँ और बहन से आपबीती बताती है और फिर आत्महत्या कर लेती है। क्या आपने ये तय कर लिया है कि सेना को आने दो और किसी का भी रेप करने दो, हम क्या करें? ”

 

सुप्रीम कोर्ट ने एजी मुकुल रोहतगी से कहा, “सेना में रेप के आरोपी हो सकते हैं…..क्या सेना में ऐसे लोग हैं जो रेप करते हैं? ये सेना की वर्दी में किया गया कथित बलात्कार है- ये एक गंभीर अपराध है।” सुप्रीम कोर्ट ने सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी को भी अदालत में तलब किया है और कहा कि वो बताये की मामले की उन्होंने कैसे जांच की। अदालत ने कहा कि सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की रिपोर्ट से ज्यादातर सवालों के जवाब नहीं मिलते और इसमें ये नहीं बताया गया है कि पीड़िता की माँ और बहन का बयान क्यों नहीं लिया गया जबकि मृत्यु से पहले पीड़िता ने उनके सामने बयान दिया था। अदालत ने कहा, “हम तय कर चुके हैं कि इस मामले की जांच की जरूरत है। टाइम-लाइन कोई मुद्दा नहीं है….बांग्लादेश अभी भी 1971 के युद्ध अपराधियों पर मुकदमा और कार्रवाई कर रहा है। ये सभी मामले करीब 15 साल पुराने हैं और उनकी जांच की जाएगी।” साल 2016 में एक आदेश में सर्वोच्च अदालत ने सुरक्षा बलों द्वारा की गयी 1528 कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच के आदेश दिये थे।

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